माँ से एक भक्त की अरदास

रावण द्वारा सीता अपहरण से राम के साथ आर्यावर्त की प्रतिष्ठा दाव पर लगी थी ।सागर लाँघ कर लंका पर चढ़ाई करना जब दुष्कर लगने लगा तब माँ की आराधना करते हुए नर-वानर की मैत्री की शक्ति स्थापित हो सकी।।मां चंद्रघंटा बनी कृपामयी। रोको माँ यह अत्याचार तन पर ,मन पर, जन जीवन पर , … Continue reading माँ से एक भक्त की अरदास

तुम गए नहीं

उस आखिरी शाम, ‌तुम्हारी उंगलियाँ मेरे पसीने से नम हाथों से ‌फिसल तो गईं ‌लेकिन, ‌तुम गए नहीं। ‌ तुम्हारी कमीज का वो बटन , ‌हर सवेरे जो कमजोर हो टूट जाता था, ‌आखिरी दफा ‌पक्के धागे से सिलकर ‌चला गया था, ‌लेकिन , ‌तुम गए नहीं। ‌ ‌सदियों से मेज पर सजती दो प्यालियाँ … Continue reading तुम गए नहीं

होली 

सुबह-सुबह कोलाहल की वजह से नींद थोड़ी टूट गई। अभी तो छह भी नहीं बजे थे। मीठे स्वप्नों को हौले-हौले अलविदा कह ही रही थी कि रसोईघर की दीवारों को लांघती सोंधी-सी...कुछ अपनी-सी खुशबू मन में समाने लगी। अहा! ...गुझिया! होली!! हमारी...तुम्हारी...हम सबकी...पसंदीदा होली। ऐसा त्योहार जो ज़िन्दगी की सम्पूर्णता को खुद में समेटे हुए … Continue reading होली