मीत

कविता रूपी विशाल सागर को, कमण्डल में समाहित करती सार हो तुम।बिखरे हुए मेरे विचलित मन को समेटकर, मुझे स्वयं से जोड़ती डोर हो तुम।मीत! मैं मौन हूँ, तो शब्द हो तुम।। अंधकार रूपी घने बादलों को छाँटकर, प्रकाश की परिधि बढ़ाते सूर्य हो तुम।चहुँ ओर प्रसारित निराशा रूपी तूफान में, हिम्मत बांधती आशा की स्त्रोत हो तुम।मीत!मैं कश्ती हूँ, … Continue reading मीत

श्रम और विश्राम

भवसागर है जो संघर्ष का, करते हैं मेहनत हम  काँटों पर चलने का, मिथ्या सुख की मृग-तृष्णा से भाग-भाग कर थकने का, बुन रहे ऐसा मकड़ी जाल इर्द-गिर्द अपने कि खुद ही साधन बटोरते अपने आप दम तोड़ने का। संसार है श्रम और तपस्या एकमात्र विश्राम। अरे! एक बार विश्राम करके तो देखो! अलल पक्षी-सा … Continue reading श्रम और विश्राम

Bless the Disease

Warm and opulent, the Sun broke freeFrom the horizon with a promising glee.Radiance striking the streets forsakenTill break of dawn when men awaken.Tarry a nonce; a quaint anomaly:On roads once bustling, now lingered monotony. A deadly sickness prevailed for long;Giving breath to Nature's mellow song.She blew her trumpet: bold and sweet;Then crept, from crevices, her … Continue reading Bless the Disease

प्रतीक्षा

चुप्पी साधे एक लड़कीजो बीच-बीच में हंसी की फुहार दबा नहीं पातीअपने कंठ से निकले ऊँचे स्वरों को कोसती है।वह ज्यादा बोलती नहीं,बस सोचती है।घुल जाती है वो मीठी प्रेम-कविताओं की चाशनी में,मिल जाती है वो इंद्रधनुष के रंगों में,सिमट जाती है वो मयूर के पंखों में,और निखर उठती है सफ़ेद-पीली धूप में।खिलखिलाते चेहरों में … Continue reading प्रतीक्षा