बदलती होली…

होली आती है, पहले की भाँति तो नहीं लेकिन दिनभर के लिए रह ही जाती है। बाज़ार माह भर पहले से नहीं लेकिन सप्ताह पहले सज ही जाते हैं। और पिताजी दो दिन पूर्व भागदौड़ में सही पकवान की सामग्री ले ही आते हैं। सामग्रियों में अब पिचकारियाँ नहीं रहती। विषाद का विषय है, लेकिन … Continue reading बदलती होली…

होली तुम भी मना लेना।

जब मुठ्ठियों में रंग भरे हुए, लोग सड़कों पर उतरेंगे आज, तुम आँखें न चुरा लेना, होली तुम भी मना लेना। आज धुल जाएंगे गिले सभी, जब प्यार से मिलेंगे गले सभी, इन बहते हुए रंगों के साथ , शिकवे सभी बहा देना, होली तुम भी मना लेना। इन दीवारों के अंदर, रहते हो साल … Continue reading होली तुम भी मना लेना।

शायद मैं तुम जैसा नहीं।

रूप में, श्रृंगार में बात में, व्यवहार में सोच में, विचार में रक्षा में, प्रहार में उपकार में, उपहार में प्रवाह में, धार में हर जीत में, हर हार में कहीं सही, तो कहीं गलत रहा हूँ मैं हाँ, थोड़ा अलग रहा हूँ मैं। कोई बात कैसे मान लूँ, जब तक न सच मैं जान … Continue reading शायद मैं तुम जैसा नहीं।

कुल-गीत

भारत को बढ़ाने के लिए, विद्या फैलाने के लिए '४९ में जन्मा बी आई टी, ज्ञान फैलाने के लिए || भारत को बढ़ाने के लिए, विद्या फैलाने के लिए, हर प्रांत से आते हैं, सब युवा यह निश्चय लिए, बी.आई.टी में सीखें कर्म, भारत को बढ़ाने के लिए || चारों ओर करें कर्म हम, होगा … Continue reading कुल-गीत

दीनता का दंश

असंतुलन समाज का फिर, नयनों के द्वार खोल रहा है जहाँ भी देखूँ , दीनता का कोई मोल रहा है हो हृदय दर्द से विचलित,खुद को टटोल रहा है, इसलिए मेरा अशांत मन चीख-चीख कर बोल रहा है, खुश है वे जिनके थाली में छप्पन भोग बरसता है। हाथें है घृत भरी और भोजन से … Continue reading दीनता का दंश