आग

आग अंदर भी है और बाहर भी। एक ऊर्जा दे रही है तो दूसरी जला रही है। पर खूबी है एक-सी, जलाकर अस्तित्व मिटा देती है। दोनों को बुझा दिया है नीर से पर एक ने छोड़ा है अवशेष तो दूसरे ने बना दिया है अवशेष मुझे।

ध्वनि

एक छुपी सी तमन्ना थी मेरी, जो कभी ख्वाहिश का नाम न ले सकी। दबी सी रह गयी वो सीने में सालों-साल, कभी ज़ुबा की कहानियां न बन सकी। सुलगती रह गयी वो अंदर ही अंदर, पर आग कभी न बन सकी, मचलते रह गए वो विचार, अल्फ़ाज़ कभी न बन सके। रोती रही वह … Continue reading ध्वनि

बेबसी

दरवाजे के चौखट पर खड़ी थी लड़की देख रही थी बड़े ध्यान से पथ को, उस पथ को जिस पर कुछ क्षण पहले ही गए थे उसके पिता दूर परदेस। आँखों में आंसू थे, कह रही थी अपनी व्यथा नींद नहीं थी, उन आँखों में रात भर गुड़िया सोई नहीं। इस उम्र में है क्या परेशानी? … Continue reading बेबसी

मैं औरत हूँ

​ न बेटी बोलते ​वक़्त तुम्हारी जुबान लड़खड़ाएगी​, न मेरी जिस्म ​टटोलने ​में तुम्हें लाज ​आएगी ​, वो हादसा ​याद ​करके ​मेरी रूह काँप जाएगी पर बगावत ​में बढ़ते कदम ​रुक जाएंगे। क्योंकि घर ​की इज़्ज़त जो ​हूँ मैं! आगे आयी ​तो ​कुचल दी जाऊँगी। नियत तुम्हारी खराब होती ​जाएगी​ , पल्लू मेरा संभलता जाएगा​ … Continue reading मैं औरत हूँ

नारी-एक कहानी

मैं नारी हूँ। सदियों पहले बनाई गई एक आकृति हूँ, जन्नत से जगत को दिया गया एक नायाब तोहफा हूँ, ईश्वर के हाथ की कलाकृति हूँ। सदियों की जुबानी हूँ। मैं नारी हूँ। मैं जन्म लेती हूँ, धरा पर कदम रखने से पहले, मार दी जाती हूँ। कदम रख भी लिया तो, ताने, दुख, दर्द, … Continue reading नारी-एक कहानी