तुम गए नहीं

उस आखिरी शाम, ‌तुम्हारी उंगलियाँ मेरे पसीने से नम हाथों से ‌फिसल तो गईं ‌लेकिन, ‌तुम गए नहीं। ‌ तुम्हारी कमीज का वो बटन , ‌हर सवेरे जो कमजोर हो टूट जाता था, ‌आखिरी दफा ‌पक्के धागे से सिलकर ‌चला गया था, ‌लेकिन , ‌तुम गए नहीं। ‌ ‌सदियों से मेज पर सजती दो प्यालियाँ … Continue reading तुम गए नहीं

आगाज़-ए-सफ़र

कई सवाल थे, सदियों से किसी के शोषण की हज़ारों अनकही बेड़ियों में जकड़ी हर उस नारी के अंतर्मन में, जिसने तीन रुप से प्रहार करते हुए एक ही शब्द को सुना, तीन बार और क्षण मात्र में खो दिया, अपना संसार । बिखर गया था उसका जीवन। हर दिन कोसा है उसने, ऐसे संविधान के … Continue reading आगाज़-ए-सफ़र

गाँधीजी के जन्मदिन पर

मैं फिर जनम लूँगा फिर मैं इसी जगह आऊँगा उचटती निगाहों की भीड़ में अभावों के बीच लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा लँगड़ाकर चलते हुए पावों को कंधा दूँगा गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को बाँहों में उठाऊँगा ।   इस समूह में इन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों में कैसा दर्द है कोई नहीं सुनता ! पर … Continue reading गाँधीजी के जन्मदिन पर

नव-सर्जना

कल ढली शाम अलग थी, आज सुबह का रूप अलग है बह रही थी जो मंद-मंद कल तक, आज हवाओं का रुख अलग है डूब गया था जो अंधेरे में आज, सूरज की धूप अलग है। यह सुबह नई शुरुआत है नव-भारत के सृजन की राष्ट्र के निर्माण को, भारत-समुद्र के मंथन को। सुनो हुंकार … Continue reading नव-सर्जना