मिलन की अभिलाषा

मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ।उसी गहरे सागर के तल में,जहाँ तुम्हारी काया धीरे-धीरेअब पानी में विलीन हो रही होगी। उस शिल्पकार कीमहीनों की मेहनत भीअब तुम्हारा कलेवर छोड़अपना अस्तित्व खो रही होगी। काले, घुंघराले मेघों-सेतुम्हारे लम्बे केश भीअब दूब की भाँतिअसीम, फैल गए होंगे। शायद,छोटी-छोटी मछलियाँउन दूब के इर्द-गिर्दअटखेलियाँ कर रही होंगी। हाँ, कहते हैं … Continue reading मिलन की अभिलाषा

तुम गए कब?

नयनों से बूँदे छलक रही हैं और तुम अश्रुओं की सीढ़ियाँ चढ़कर नैनों से उर में समा रहे हो। सब कहते हैं- तुम जा रहे हो। पर मैं कहती हूँ- तुम आ रहे हो। बीत गए रैन कई, भोर भी देखे कई, मौसम भी बदले और साल भी गुज़रे कई। शीतल बह रही बयार है, … Continue reading तुम गए कब?

शौर्यगाथा

मैं खुशकिस्मत था, जो लला था, कृष्ण कन्हैया सा, दो माँओं का लाडला, एक का सूरज दूजे का चाँद-दुलारा। एक माँ ने जन्म दिया, फ़ौलादों-सा जिगर और हौसला बुलंद दिया, पर दूजी की सेवा को मुझे खुद से ही दूर किया। एक माँ की रक्षा करने को सरसों के खेतों से, गलियों और चौराहों से, … Continue reading शौर्यगाथा

एक रोज़ यूँही….

इक रोज यूँही नापूँगा क्षितिज तुम्हारी आँखों का भीतर संजोया है तुमने हाड़ माँस से बने शरीर में गूढ़ अवचेतन रहस्य कई, तय करूँगा परिचय से प्रेम तक के अपरिमित छोरों का सफर। लूँगा उड़ान उधार बसंत में नहाए विहग से उड़ूँगा पंख पसार घेरूँगा ज़मीं उतनी सिमट आए जिसमें बिखरे अधूरे स्वप्न मेरे। निहारूँगा … Continue reading एक रोज़ यूँही….

होली

उड़े रंग, अबीर- गुलाल, नाचे मन हो कर निहाल। सब ओर है छाया, बैंगनी रंग में रहस्यमयी माया। फिर भी है सागर और गगन, नीली चादर ओढ़े ये मगन। लह-लहा रही हैं फसलें हरी-भरी, समृद्धि लेकर ये खड़ीं। आनंद में है, चमक रहा, सूर्य का पीला रंग बिखर रहा। लाल और केसरी भी उड़ रही, … Continue reading होली