अस्तित्व सवाल करता है

कुछ इठला कर, एक बच्चे की तरह अभिमान भरी आँखों से, एक बूढ़े शेर की तरह व्यंग्य करता है; मेरा अस्तित्व मुझसे सवाल करता है।   रोज़ आईने में दिखती है एक धुंधली तस्वीर धूल जम गई है शायद मैं नहीं हूँ... मुझ पर हँसता है; मेरा अस्तित्व मुझसे सवाल करता है।   कौन हो … Continue reading अस्तित्व सवाल करता है

नन्हीं-सी माँ

रात अपने अंधकार में न जाने कितनी बातों को समेटे रखती है। जब हर ओर सन्नाटा होता है...और इसी सन्नाटे में कई ख्वाब खिलते हैं किन्हीं कच्ची आँखों में। वह भी कोई ऐसी ही रात थी, जब उसकी नींद करवटों में कट रही थी और आँखों को सपनों ने निगल रखा था। करवटें...जो कहीं न … Continue reading नन्हीं-सी माँ

मैं, चींटी और प्रेरणा

क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे पलकों पर अश्रु लिए हो अपनी मंजिल से परे; क्या, इतनी-सी है तेरी संसार! शून्य की भी प्राप्ति नहीं होती बिना उचित प्रयास किए क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे होकर, अपनी मंजिल से परे। मैं एक मामूली-सी चींटी हार का रस कभी न पीती असंख्य प्रयासों … Continue reading मैं, चींटी और प्रेरणा