आग हाथों में

आग वो हाथों में लगा के चलता है छूता है जिसको जला के चलता है   करता ही रहा है सिफारिश झूठ की फिर भी देखो सर उठा के चलता है   हुआ है पैगम्बर तारीकियों का अब चराग वो घरों के बुझा के चलता है   जमीर जिसने बेच दी और क्या करे वो … Continue reading आग हाथों में

गीत मेरे… नज़्म तेरे…

किस ओर चला है तू, पीछे छोड़ सारा जहान कुछ यादें है अनकही, कुछ नग़में हैं अनसुने उन अधूरे किस्सों को तन्हा छोड़, तू क्यों रहे तन्हा । सीने में उलझन किसी टूटे नज़्म-सी है इंतज़ार करे तो किसका...किस तरह... जिसे हो आता इन्हें अंतरतम की ध्वनियों में पिरोना जिसके अंतर से हो निकलते अधूरे … Continue reading गीत मेरे… नज़्म तेरे…