पराई बेटी

लिपट तेरे दामन से वो बिटिया यूँ रोने लगी कल तक तेरी परछाई कहने वाली, खुद को पराई कहने लगी खोल तेरा ओढ़ आई एक गुड़िया बासी-सी यादें वो उसकी, आज मेरे अल्फाज़ों में बहने लगी… दर्पण आँखों की तेरी, से खुद को सजाया करती है कभी आँगन में बैठ तेरे जुड़े बनाया करती है … Continue reading पराई बेटी

अस्तित्व सवाल करता है

कुछ इठला कर, एक बच्चे की तरह अभिमान भरी आँखों से, एक बूढ़े शेर की तरह व्यंग्य करता है; मेरा अस्तित्व मुझसे सवाल करता है।   रोज़ आईने में दिखती है एक धुंधली तस्वीर धूल जम गई है शायद मैं नहीं हूँ... मुझ पर हँसता है; मेरा अस्तित्व मुझसे सवाल करता है।   कौन हो … Continue reading अस्तित्व सवाल करता है

मैं, चींटी और प्रेरणा

क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे पलकों पर अश्रु लिए हो अपनी मंजिल से परे; क्या, इतनी-सी है तेरी संसार! शून्य की भी प्राप्ति नहीं होती बिना उचित प्रयास किए क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे होकर, अपनी मंजिल से परे। मैं एक मामूली-सी चींटी हार का रस कभी न पीती असंख्य प्रयासों … Continue reading मैं, चींटी और प्रेरणा

गीत मेरे… नज़्म तेरे…

किस ओर चला है तू, पीछे छोड़ सारा जहान कुछ यादें है अनकही, कुछ नग़में हैं अनसुने उन अधूरे किस्सों को तन्हा छोड़, तू क्यों रहे तन्हा । सीने में उलझन किसी टूटे नज़्म-सी है इंतज़ार करे तो किसका...किस तरह... जिसे हो आता इन्हें अंतरतम की ध्वनियों में पिरोना जिसके अंतर से हो निकलते अधूरे … Continue reading गीत मेरे… नज़्म तेरे…