अलौकिक प्रेम

जब तुम परोक्ष होते हो कौंधे निज हृदय में बातें, चाहूँ पर न करूँ शिकायतें, और जो अब सन्मुख हो मेरे बिसरा गई है सब कुछ, रह गए केवल तुम हो। आसक्ति के समुद्र में ढूँढने चले, प्रेम-मोती वहाँ कैसे मिले? निर्धूम अग्नि में जो न जले, तो आनंद फुहारे कैसे मिले? मन व पवन … Continue reading अलौकिक प्रेम

तुम गए कब?

नयनों से बूँदे छलक रही हैं और तुम अश्रुओं की सीढ़ियाँ चढ़कर नैनों से उर में समा रहे हो। सब कहते हैं- तुम जा रहे हो। पर मैं कहती हूँ- तुम आ रहे हो। बीत गए रैन कई, भोर भी देखे कई, मौसम भी बदले और साल भी गुज़रे कई। शीतल बह रही बयार है, … Continue reading तुम गए कब?

शौर्यगाथा

मैं खुशकिस्मत था, जो लला था, कृष्ण कन्हैया सा, दो माँओं का लाडला, एक का सूरज दूजे का चाँद-दुलारा। एक माँ ने जन्म दिया, फ़ौलादों-सा जिगर और हौसला बुलंद दिया, पर दूजी की सेवा को मुझे खुद से ही दूर किया। एक माँ की रक्षा करने को सरसों के खेतों से, गलियों और चौराहों से, … Continue reading शौर्यगाथा

होली

उड़े रंग, अबीर- गुलाल, नाचे मन हो कर निहाल। सब ओर है छाया, बैंगनी रंग में रहस्यमयी माया। फिर भी है सागर और गगन, नीली चादर ओढ़े ये मगन। लह-लहा रही हैं फसलें हरी-भरी, समृद्धि लेकर ये खड़ीं। आनंद में है, चमक रहा, सूर्य का पीला रंग बिखर रहा। लाल और केसरी भी उड़ रही, … Continue reading होली

बी.आई.टी. सिंदरी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आयोजन

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।- श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हमारी मातृभाषा एवं संस्कृति ही वह डोर है जो हमें हमारे देश से जोड़े रखती है। तत्कालीन समय में हमारी पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है और इसके साथ-साथ विविधताओं में भी … Continue reading बी.आई.टी. सिंदरी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आयोजन