जब तुम परोक्ष होते हो
कौंधे निज हृदय में बातें,
चाहूँ पर न करूँ शिकायतें,
और जो अब सन्मुख हो मेरे
बिसरा गई है सब कुछ,
रह गए केवल तुम हो।

आसक्ति के समुद्र में ढूँढने चले,
प्रेम-मोती वहाँ कैसे मिले?
निर्धूम अग्नि में जो न जले,
तो आनंद फुहारे कैसे मिले?
मन व पवन के त्याग बिना,
शुद्ध प्रेम कैसे आगे बढ़ चले?

पंक से अलग हो पंकज
प्रेम करे ऊर्ध्वगामी सूर्य से।
पतंगा छोड़ संसार को
इश्क़ निभाये अनल से।
सीखें प्रेम-अनुराग हम
मीन नीर के संबंध से।

निज शीश, हृदय व आत्मा,
जब सौंप दिया तेरे चरणों में।
धैर्य, श्रद्धा और अधीनता का
जब कमाया धन अंतर में।
तब पाया प्रत्युत्तर तुम्हारा
शाश्वत प्रेम संबंध में।

One thought on “अलौकिक प्रेम

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