नन्हीं-सी माँ

रात अपने अंधकार में न जाने कितनी बातों को समेटे रखती है। जब हर ओर सन्नाटा होता है...और इसी सन्नाटे में कई ख्वाब खिलते हैं किन्हीं कच्ची आँखों में। वह भी कोई ऐसी ही रात थी, जब उसकी नींद करवटों में कट रही थी और आँखों को सपनों ने निगल रखा था। करवटें...जो कहीं न … Continue reading नन्हीं-सी माँ

मैं, चींटी और प्रेरणा

क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे पलकों पर अश्रु लिए हो अपनी मंजिल से परे; क्या, इतनी-सी है तेरी संसार! शून्य की भी प्राप्ति नहीं होती बिना उचित प्रयास किए क्यों बैठा है सिर पर हाथ धरे होकर, अपनी मंजिल से परे। मैं एक मामूली-सी चींटी हार का रस कभी न पीती असंख्य प्रयासों … Continue reading मैं, चींटी और प्रेरणा

नव-सर्जना

कल ढली शाम अलग थी, आज सुबह का रूप अलग है बह रही थी जो मंद-मंद कल तक, आज हवाओं का रुख अलग है डूब गया था जो अंधेरे में आज, सूरज की धूप अलग है। यह सुबह नई शुरुआत है नव-भारत के सृजन की राष्ट्र के निर्माण को, भारत-समुद्र के मंथन को। सुनो हुंकार … Continue reading नव-सर्जना