माँ से एक भक्त की अरदास

रावण द्वारा सीता अपहरण से राम के साथ आर्यावर्त की प्रतिष्ठा दाव पर लगी थी ।सागर लाँघ कर लंका पर चढ़ाई करना जब दुष्कर लगने लगा तब माँ की आराधना करते हुए नर-वानर की मैत्री की शक्ति स्थापित हो सकी।।मां चंद्रघंटा बनी कृपामयी। रोको माँ यह अत्याचार तन पर ,मन पर, जन जीवन पर , … Continue reading माँ से एक भक्त की अरदास

शैल पुत्री

माँ शैल पुत्री शैल शिखर से वृषभ यान पर कैसे आ टपकी हो माँ । इन बच्चों के लिए न जाने , कहाँ-कहाँ भटकी हो माँ । जंगल -जंगल ,वन -उपवन में , खोज लिया मुझको निर्जन में, यही सोच कर भूल न जाऊँ , श्वाँस तुम्हारी अटकी माँ ।। इन बच्चों के लिए न … Continue reading शैल पुत्री

तुम भी रह गए बापू,दिल्ली के ही होकर

बापू के जन्म दिवस पर, राजधानी दिल्ली के राजघाट पहुँचने के लिए उद्वेलन भरा किसान आन्दोलन। प्रस्तुत कविता में उन अन्नदाता किसान पुत्रों के मन की पीड़ा को मरहम का उपहार दिलाने के उद्देश्य से ही किसी महात्मा के जन्म दिवस की छायावादी अंदाज में व्याख्या हुई है, जो आज की ताजी खबर होगी । … Continue reading तुम भी रह गए बापू,दिल्ली के ही होकर

तू है नहीं

हाँ,तू है नहीं तो क्या, अगर तू है नहीं। कहने को तो कह दिया, पर बात इतनी भी साधारण नहीं रोने को तो रो लिया, पर आँसुओं की किसी को आदत नहीं। बहुत सोचती थी किसी को अपनी सोच बताती, कि किसी की हमदर्द हमराही बन जाती पर सोच का कोई हमसफ़र नहीं शायद इसलिए … Continue reading तू है नहीं

रूह की आज़ादी

शायर है ये दिल, कुछ न कुछ लिखता रहता है सुनता तो कम ही है मेरी, अक्सर कुछ न कुछ कहता रहता है। जिन्हें कागज़ पे उकेरा, वो तो आज भी सलामत हैं बाकी रेत पे लिखे जज़्बातों को, कब का समुन्दर बहा ले गया। चाँदनी रात के तले, मैं उस से सब कुछ कह … Continue reading रूह की आज़ादी

आसां कहाँ है ?

१.हवाएँ भी कभी-कभी शैतानियाँ करती हैं, कभी पेड़ों से, कभी पहाड़ों से बेईमानियाँ करती हैं, जब शाम ढले खेतों से होकर गुजरती हैं, किसानों के छोटे बच्चों संग नादानियाँ भी करती हैं, मंदिर में भी जाती हैं, मस्जिद में भी आती हैं, कभी फुरसत से चर्च की घंटी भी बजाती हैं, ओ मजहब के पहरेदारों! … Continue reading आसां कहाँ है ?