आओ मिलकर दीप जलाएं

प्रकाशपर्व की मधुर बेला में आओ मिलकर दीप जलाएं स्नेह-साधना करें अनवरत जग में नव प्रकाश फैलाएँ| आलोकित हो हर घर, आँगन हर घर कुछ यूँ जगमगाए झिलमिल दीपों के क्षण पावन हर्ष का एहसास कराए| जलाएँ दीप चहुँओर आओ, मिलकर सभी आगे आएँ अंत करें तम निशा का रजनी को नव भोर बनाएँ| शुभ-लाभ … Continue reading आओ मिलकर दीप जलाएं

तुम भी रह गए बापू,दिल्ली के ही होकर

बापू के जन्म दिवस पर, राजधानी दिल्ली के राजघाट पहुँचने के लिए उद्वेलन भरा किसान आन्दोलन। प्रस्तुत कविता में उन अन्नदाता किसान पुत्रों के मन की पीड़ा को मरहम का उपहार दिलाने के उद्देश्य से ही किसी महात्मा के जन्म दिवस की छायावादी अंदाज में व्याख्या हुई है, जो आज की ताजी खबर होगी । … Continue reading तुम भी रह गए बापू,दिल्ली के ही होकर

तू है नहीं

हाँ,तू है नहीं तो क्या, अगर तू है नहीं। कहने को तो कह दिया, पर बात इतनी भी साधारण नहीं रोने को तो रो लिया, पर आँसुओं की किसी को आदत नहीं। बहुत सोचती थी किसी को अपनी सोच बताती, कि किसी की हमदर्द हमराही बन जाती पर सोच का कोई हमसफ़र नहीं शायद इसलिए … Continue reading तू है नहीं

रूह की आज़ादी

शायर है ये दिल, कुछ न कुछ लिखता रहता है सुनता तो कम ही है मेरी, अक्सर कुछ न कुछ कहता रहता है। जिन्हें कागज़ पे उकेरा, वो तो आज भी सलामत हैं बाकी रेत पे लिखे जज़्बातों को, कब का समुन्दर बहा ले गया। चाँदनी रात के तले, मैं उस से सब कुछ कह … Continue reading रूह की आज़ादी

आसां कहाँ है ?

१.हवाएँ भी कभी-कभी शैतानियाँ करती हैं, कभी पेड़ों से, कभी पहाड़ों से बेईमानियाँ करती हैं, जब शाम ढले खेतों से होकर गुजरती हैं, किसानों के छोटे बच्चों संग नादानियाँ भी करती हैं, मंदिर में भी जाती हैं, मस्जिद में भी आती हैं, कभी फुरसत से चर्च की घंटी भी बजाती हैं, ओ मजहब के पहरेदारों! … Continue reading आसां कहाँ है ?

है ये ज़िंदगी

ज़िन्दगी क्या है, किस लिए है? वास्तव में यह कोई समझ नहीं पाया। हर शख्स इसे अपने अनुसार जीना चाहे, पर कांटों से भरी पड़ी है जिंदगी की राह, बावजूद इसके कभी न कम होगी जीने की चाह। कभी ठोकरें खाई, उदास हुए कभी सफलता मिली तो मुस्कराए । हर पल बदलती रही यह जिंदगी, … Continue reading है ये ज़िंदगी