पहली ‘गुड मॉर्निंग’

पाँव छूने के लिए जो मैंने अपने सिर को झुकाया, तो वापस उसे उठाने की हिम्मत नहीं हो पाई | हॉस्टल के उस गेट के बाहर वह मेरे और मेरे माता-पिता की वियोग की बेला थी | इतने वर्षों में मैं एक क्षण भी अपने माता-पिता से इतनी दूर नहीं हुई और यहाँ अचानक से … Continue reading पहली ‘गुड मॉर्निंग’

​क्या सच में…मैं अब जा रही हूँ ?

यादें सहेज कर , सम्भाल कर अब मैं जा रही हूँ, इस उलझन में हूँ कि ये सब आपसे कह रही हूँ या खुद को बतला रही हूँ, क्या सच में...मैं अब जा रही हूँ ? चलो... अब तो जाने का वक़्त है, किसी से रूठी हूँ तो खुद मान जाने का वक़्त है, जो … Continue reading ​क्या सच में…मैं अब जा रही हूँ ?

बिटिया की पाती:माँ के नाम

माँ, कल मैं अलमारी साफ कर रही थी । हाँ, कर लेती हूँ अब,आप जो नहीं हैं मेरे पास। अलमारी में उमड़े तूफ़ान से लड़ते लड़ते थक कर सुस्ताने बैठी तो आप ही जेहन में थीं।कितना आसान था सबकुछ, सारी उधेड़बुन से निकलना ,चाहे वो अलमारी की बात हो या मुश्किलों की... और न जाने … Continue reading बिटिया की पाती:माँ के नाम

तुम गए नहीं

उस आखिरी शाम, ‌तुम्हारी उंगलियाँ मेरे पसीने से नम हाथों से ‌फिसल तो गईं ‌लेकिन, ‌तुम गए नहीं। ‌ तुम्हारी कमीज का वो बटन , ‌हर सवेरे जो कमजोर हो टूट जाता था, ‌आखिरी दफा ‌पक्के धागे से सिलकर ‌चला गया था, ‌लेकिन , ‌तुम गए नहीं। ‌ ‌सदियों से मेज पर सजती दो प्यालियाँ … Continue reading तुम गए नहीं