शौर्यगाथा

मैं खुशकिस्मत था, जो लला था, कृष्ण कन्हैया सा, दो माँओं का लाडला, एक का सूरज दूजे का चाँद-दुलारा। एक माँ ने जन्म दिया, फ़ौलादों-सा जिगर और हौसला बुलंद दिया, पर दूजी की सेवा को मुझे खुद से ही दूर किया। एक माँ की रक्षा करने को सरसों के खेतों से, गलियों और चौराहों से, … Continue reading शौर्यगाथा

एक रोज़ यूँही….

इक रोज यूँही नापूँगा क्षितिज तुम्हारी आँखों का भीतर संजोया है तुमने हाड़ माँस से बने शरीर में गूढ़ अवचेतन रहस्य कई, तय करूँगा परिचय से प्रेम तक के अपरिमित छोरों का सफर। लूँगा उड़ान उधार बसंत में नहाए विहग से उड़ूँगा पंख पसार घेरूँगा ज़मीं उतनी सिमट आए जिसमें बिखरे अधूरे स्वप्न मेरे। निहारूँगा … Continue reading एक रोज़ यूँही….

होली

उड़े रंग, अबीर- गुलाल, नाचे मन हो कर निहाल। सब ओर है छाया, बैंगनी रंग में रहस्यमयी माया। फिर भी है सागर और गगन, नीली चादर ओढ़े ये मगन। लह-लहा रही हैं फसलें हरी-भरी, समृद्धि लेकर ये खड़ीं। आनंद में है, चमक रहा, सूर्य का पीला रंग बिखर रहा। लाल और केसरी भी उड़ रही, … Continue reading होली

यूँ ही नहीं

घर-परिवार की रौनक बढ़ाती, खुशियों से आँगन महकाती, पीढ़ियों से बोझ कहलाने का दर्द सहती, आज खुद परिवार की जिम्मेदारी उठाती, यूँ ही नहीं,  वे बेटियाँ कहलाती |   एक नहीं, दो घरों को संभालती, स्वयं का घर छोड़, पराये घर को अपनाती, निरंतर अपनों की खुशियों को सींचती, सदैव सुख-समृद्धि की कामना करती, यूँ … Continue reading यूँ ही नहीं

बी.आई.टी. सिंदरी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आयोजन

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।- श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हमारी मातृभाषा एवं संस्कृति ही वह डोर है जो हमें हमारे देश से जोड़े रखती है। तत्कालीन समय में हमारी पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है और इसके साथ-साथ विविधताओं में भी … Continue reading बी.आई.टी. सिंदरी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आयोजन