एक रोज़ यूँही….

इक रोज यूँही नापूँगा क्षितिज तुम्हारी आँखों का भीतर संजोया है तुमने हाड़ माँस से बने शरीर में गूढ़ अवचेतन रहस्य कई, तय करूँगा परिचय से प्रेम तक के अपरिमित छोरों का सफर। लूँगा उड़ान उधार बसंत में नहाए विहग से उड़ूँगा पंख पसार घेरूँगा ज़मीं उतनी सिमट आए जिसमें बिखरे अधूरे स्वप्न मेरे। निहारूँगा … Continue reading एक रोज़ यूँही….

होली

उड़े रंग, अबीर- गुलाल, नाचे मन हो कर निहाल। सब ओर है छाया, बैंगनी रंग में रहस्यमयी माया। फिर भी है सागर और गगन, नीली चादर ओढ़े ये मगन। लह-लहा रही हैं फसलें हरी-भरी, समृद्धि लेकर ये खड़ीं। आनंद में है, चमक रहा, सूर्य का पीला रंग बिखर रहा। लाल और केसरी भी उड़ रही, … Continue reading होली

यूँ ही नहीं

घर-परिवार की रौनक बढ़ाती, खुशियों से आँगन महकाती, पीढ़ियों से बोझ कहलाने का दर्द सहती, आज खुद परिवार की जिम्मेदारी उठाती, यूँ ही नहीं,  वे बेटियाँ कहलाती |   एक नहीं, दो घरों को संभालती, स्वयं का घर छोड़, पराये घर को अपनाती, निरंतर अपनों की खुशियों को सींचती, सदैव सुख-समृद्धि की कामना करती, यूँ … Continue reading यूँ ही नहीं

आग

आग अंदर भी है और बाहर भी। एक ऊर्जा दे रही है तो दूसरी जला रही है। पर खूबी है एक-सी, जलाकर अस्तित्व मिटा देती है। दोनों को बुझा दिया है नीर से पर एक ने छोड़ा है अवशेष तो दूसरे ने बना दिया है अवशेष मुझे।

बेबसी

दरवाजे के चौखट पर खड़ी थी लड़की देख रही थी बड़े ध्यान से पथ को, उस पथ को जिस पर कुछ क्षण पहले ही गए थे उसके पिता दूर परदेस। आँखों में आंसू थे, कह रही थी अपनी व्यथा नींद नहीं थी, उन आँखों में रात भर गुड़िया सोई नहीं। इस उम्र में है क्या परेशानी? … Continue reading बेबसी