आँखों की आँख-मिचौली

ये आँखें, ये नयन और न जाने क्या-क्या, कभी ये इतनी बार झपकती है कि जिसका इंतज़ार रहता है, जिस खुशी का, वह एक ही बार में पा जाते हैं। कभी यह ऐसा खेल खेलती है कि चाहते हुए भी झपकती नहीं। टकटकी लगाए हुए ये निगाहें उस रास्ते की तरफ़ देखते रहती है। कभी … Continue reading आँखों की आँख-मिचौली

न जाने कितनों का हाथ वही

निर्मम सिमट सिकुड़ वह सोया था, अँधेरे चौराहेे की चौखट पर वह खोया था। चादर ओढ़े सिर छिपाए, पाँव फिर भी निकले थे, सनसनाती हवा चली, पैरों को छू, निकली थी। काँप गए बदन मेरे देख वह एहसास, क्या बीती होगी उस पर जब टूटे होंगे जज़्बात? मन न माना, जी मचल उठा पूछने को … Continue reading न जाने कितनों का हाथ वही

माँ का लाल

जंग के मैदान में लाल था, बेचारी माँ का हाल बेहाल था। उसकी एक झलक को तड़पती पर लाल पर देश की रक्षा का भार था। माँ का दर्द हवाओं ने उस तक पहुँचाया, "कैसा निर्मोही है तू!" उन फिज़ाओं ने उसके कानों में बुदबुदाया। नम तो उसकी भी आँखें थी, उसने भी अपना दुखड़ा … Continue reading माँ का लाल

और फिर सुबह भी हो गई…

अहले सुबह की बात थी, बीती अभी ही रात थी। बह रही चारों तरफ़, आदित्य की प्रकाश थी। सबमें नई ऊर्जा, नई उमंग औ उल्लास थी। हर नजर में सज रही, नूतन सुनहरी ख्वाब थी। ये उस पहर की बात थी, पहली पहर की बात थी। पौ फटने लग गई, चिड़िया चहकने लग गई। नजरें … Continue reading और फिर सुबह भी हो गई…