हमारा यह भारतवर्ष त्योहारों का देश है, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। त्योहार सिर्फ संस्कृति और परंपरा का प्रदर्शन मात्र नहीं अपितु हमारे जीवन शैली का एक अभिन्न अंग हैं, जिनका उद्देश्य आम जन मानस के जीवन में आनंद एवं उल्लास का रंग भरना है। ये त्योहार सीखने का अवसर प्रदान करते हैं, हर्षोउल्लास और उत्सव के साथ हमारी चेतना को जागृत करने का कार्य करते हैं। कुछ पर्व हमें कर्म की प्रधानता समझाते हैं, तो कुछ नैतिक मूल्यों का महत्व बताते हैं। सनातन दर्शन में एक उत्कृष्ट एवं आदर्श जीवन जीने की संपूर्ण रूपरेखा स्पष्ट रूप से दिखाई गई है, जहां कर्म की प्रधानता से लेकर भक्ति में संपूर्ण समर्पण तक सामंजस्य स्थापित किया गया है। जीवन के सूक्ष्मतम पहलुओं से लेकर अत्यंत जटिल एवं गुढ़ बातों को सरल तरीके से आम जन को समझाने के लिए उन्हें त्योहारों के साथ जोड़कर आत्मसात किया जाता है।

विजयादशमी एवं नवरात्रि हिंदु धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक हैं। नवरात्रि का पर्याय नौ रातों से है, जिनमें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। यह त्योहार हमें माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए भीषण युद्ध का स्मरण कराता है। नौ दिनों के भीषण संग्राम के पश्चात अंततः दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था।

माता दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, और नवरात्रि के नौ दिन माता के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। शिव और शक्ति अर्थात पुरुष और प्रकृति के मिलन से संपूर्ण संसार अस्तित्व में आया है। शिव चेतना के प्रतीक हैं वहीं शक्ति प्रकृति हैं। कुछ पौराणिक ग्रंथों में देवी दुर्गा को विष्णु की योगमाया के रूप में दर्शाया गया है जो प्रकृति को ही इंगित करती हैं। माता के नौ स्वरूप प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को प्रदर्शित करते हैं।

“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।”

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री माता के नव स्वरूप हैं जो हमें आध्यात्म एवं भक्ति की ओर आकृष्ट करती हैं। यह त्योहार शक्ति की उपासना का संदेश देती है, संपूर्ण चराचर में व्याप्त शक्ति और हमारे अंतर मन में विद्यमान शक्ति का स्रोत एक ही है। नवरात्रि के नौ दिन हमें माता के विभिन्न स्वरूप में विद्यमान शक्तियों से अवगत कराते हैं एवं हमें हमारे बोध को जागृत करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

विजयदशमी प्रतिवर्ष नवरात्रि के नौ दिनों के पश्चात अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध किया था। विजयादशमी का महत्व केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में ही नहीं अपितु इसका सामाजिक दृष्टि से भी गहरा प्रभाव है। यह त्योहार इस बात का प्रतीक है कि अधर्म की जड़ें कितनी भी मजबूत क्यों न हो, वह कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो, उसका विनाश निश्चित है। लंकापति रावण ने अपने अहंकार में चूर होकर माता सीता का हरण कर लिया था। तब श्री राम ने रावण का अंत कर सीता माँ की रक्षा की थी। यह कथा आज भी लोगों को सत्य और धर्म का पक्ष लेने के लिए प्रेरित करती है। प्रतिवर्ष हर शहर और गाँव में रावण दहन का आयोजन किया जाता है। जब रावण का पुतला जलाया जाता है तो लोग कामना करते हैं कि उसके साथ सारे सामाजिक विकार भी भस्म हो जाएं।

नवरात्रि और विजयादशमी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, अपितु इसका आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक महत्व भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता की विभिन्न रूपों का पूजन करने के लिए लोग विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, अपने घरों में कलश बैठाते हैं और सार्वजनिक स्थानों पर देवी माँ की मूर्ति स्थापित करते हैं। इन नौ दिनों के दौरान सभी लोग एकसाथ देवी माँ की पूजा करते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द का भाव प्रबल होता है। इस आयोजन का समापन दशहरा के साथ होता है जो पूरे भारत में एक ही तिथि पर मनाई जाती है, किंतु इसे मनाने के तरीके अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं। भारत के कई क्षेत्रों में इसे शस्त्र पूजन के रूप में मनाया जाता है तो वहीं उत्तर भारत में रामलीला दिखाना और रावण दहन करना इस त्योहार की प्रमुखताएँ हैं। पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवं असम में दुर्गा पूजा के समापन के रूप में, माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में शमी पूजन और विजय आराधना का प्रचलन है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं केरल में “गोलू” (गुड़ियों की सजावट) और बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत (विद्या आरंभ) की परंपरा है। यह परंपराओं में विविधता ही भारतवर्ष और इसके त्योहारों को इस विश्व में अनूठा बनाती है।

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