“कुछ पाने की कोशिश में रहेंगे अगर, तो कुछ कर दिखाने का मौका भी अपने आप ही मिल जाएगा।” इन सरल शब्दों से उत्पन्न कठिन परिभाषा को जीवंत कर दिखाया है-“मिरर इमेज मैन” श्री पीयूष गोयल जी ने। पेशे से एक मेकैनिकल इंजीनियर व विश्व प्रसिद्ध लेखक श्री पीयूष गोयल ने निरंतर ही अपनी लेखन शैली को एक नया आयाम देने का प्रयास किया है। जी हाँ! यह वही प्रसिद्ध लेखक हैं जिन्होंने सुई से विश्व की पहली पुस्तक लिखकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। श्री गोयल हमेशा से ही सबसे अलग, कुछ नया करने को तत्पर रहे हैं, फिर चाहे वह मिरर इमेजिंग करना हो या फिर सुई से पुस्तक लिखना। हाल ही में उनकी एक स्वरचित पुस्तक “सोचना तो पड़ेगा ही” नाम से प्रकाशित हुई जिसने उनके व्यक्तित्व को एक नई ऊँचाई और एक नई दिशा दी। सौभाग्यवश सर्जना को उनसे बातचीत कर उनके अद्भुत व्यक्तित्व को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रस्तुत है सर्जना से हुई उनकी बातचीत के कुछ अंश-

सर्जना- सर, हममें से अधिकांश लोग ‘मिरर इमेज’ अर्थात् दर्पण छवि लेखन से अनभिज्ञ हैं। हमें बेहद प्रसन्नता होगी अगर आप इस लेखन शैली पर कुछ जानकारी साझा करें।
पीयूष सर- मैं सर्जना परिवार का बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ कि आप सब ने मुझे इस मंच पर आमंत्रित किया। सबसे पहले तो मैं अपना परिचय देना चाहता हूँ। मेरा नाम पीयूष गोयल है और मेरा जन्म एक मध्यम-वर्गीय परिवार में हुआ। मैं यांत्रिकी अभियंत्रण का छात्र रहा हूँ एवं २५ वर्षों से कार्यरत हूँ और विभिन्न कंपनियों का हिस्सा रह चुका हूँ। लेखन क्षेत्र में मेरी बचपन से ही रुचि रही है। आपका प्रश्न  यह था कि दर्पण शैली क्या है। दर्पण शैली में अक्षर को उल्टा लिखना होता है और समस्त लेखन उसी अनुसार उल्टा लिखा हुआ होता है। मैंने पहले यह शैली अंग्रेज़ी भाषा में शुरू की थी फ़िर हिन्दी में लिखना शुरू किया।सन १९८२ मैं मैने संग्रह करना शुरू किया और १९८७ से दर्पण छवि में लिखना शुरू किया और इस शैली में परिपक्व हो गया। २००३ में मेरे जीवन में कुछ कठिनाईयाँ आई जिस कारण मुझे घर पर कुछ महीनों तक बेबस बैठना पड़ा। इस समय का मैंने सदुपयोग किया और भगवद्गीता पढ़ना शुरू किया। फिर जीवन पटरी पर आई और मैंने भगवद्गीता के १८ अध्याय ७०० श्लोक श्लोकों को उल्टे अक्षरों में लिखा वह भी हिन्दी में। मैं आप सभी को भगवद्गीता पढ़ने को कहूँगा क्योंकि यह सकारात्मक विचारों का स्रोत है जिसे पढ़ कर जीवन में ज़रूर बदलाव आता है। मैंने पाॅंच वर्षों के बाद सुई से हरिवंश राय बच्चन जी की पुस्तक मधुशाला लिखी। ये विश्व में पहली पुस्तक है जो सुई से लिखी गई है।

सर्जना- आपको श्री हरिवंश राय बच्चन जी की पुस्तक ‘मधुशाला’ को एक ‘निडल पुस्तक’ का रूप देकर कैसा महसूस हुआ? आपके जीवन में आये कोई बदलाव?
पीयूष सर- यह पुस्तक मेरे लिए बहुत प्रिय है क्योंकि ये विश्व रिकॉर्ड बन गई थी। इस किताब को लिखने के बाद लोग मुझे ‘मिरर मैन ऑफ इंडिया’ से जानने लगे। लोग मेरे साथ चित्र लेते हैं, मुझसे मिलते हैं और मेरी कला की तारीफ़ करते हैं। इतने स्नेह और प्रोत्साहन के लिए मैं सभी का हृदय से आभारी हूँ।

सर्जना- सर आपको “मिरर इमेज राइटिंग” का विचार कहाँ से आया?
पीयूष सर- मैं आपको बताना चाहूँगा कि मैंने मिरर इमेज राइटिंग के बारे में काफ़ी अध्ययन किया। यह आपके लिए आवश्यक होता है कि आप अध्ययन करने के बाद ही अपनी सोच को एक रूप दें। मैं आपको यह बताना चाहूँगा कि यद्यपि मेरे दोस्त कम थे किंतु जितने भी थे, उन सब ने जीवन में हमेशा मुझे सही सलाह ही दी। मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा कि मुझमें यह कर दिखाने की क्षमता है और मैं कर सकता हूँ। यदि आपके मित्र आपको सही सलाह दें, तो वह आपकी ज़िंदगी बदल सकती है। मैंने भी अपनी मेहनत को जब सही दिशा दी, तब सब कुछ सही होने लगा। मैंने थोड़ी बहुत स्टडी की और मुझे पता चला कि इस क्षेत्र में तो बहुत कम लोगों ने लिखा है। फिर मैंने इस लेखन शैली में ही आगे बढ़ने का निश्चय किया। ऐसे तो मैंने शुरुआत भले १९८७ में की, फिर २००३ से २०१५ तक में लिखता रहा। इसी प्रकार धीरे-धीरे कोशिश करते हुए मैं इस लेखन शैली में दक्ष हो गया। इन जगहों पर यदि आपको भाग्य का साथ मिल जाए तो आप बहुत कुछ कर सकते हैं। मुझे भी यक़ीन था कि यदि आप सच्चे मन और ईमानदारी से कोई कार्य करते हैं, तो ऊपर वाला आपका सदैव साथ देता है।

सर्जना- सर हाल ही में आपकी पुस्तक “सोचना तो पड़ेगा ही” प्रकाशित हुई, तो सर हम ये जानना चाहते हैं कि आपको यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
पीयूष सर- यह तो है कि हर चीज़ के पीछे एक प्रेरणा होती है। यह बात कोरोना और लॉकडाउन से पहले की है। मुझे हमेशा से कविताओं का शौक़ रहा है किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि अब शाय़द मुझे कोट्स लिखना चाहिए। तो मैंने फिर एक वाॅट्सऐप्प ग्रुप बनाया और मेरा यही निश्चय था कि मेरे मन में जो भी एक अच्छी बात किसी कोट् के रूप में आएगी, तो मैं उसे ग्रुप में डालूंगा। सोच इतनी-सी ही थी कि यदि ३६५ कोट्स डालूँ किन्तु मैं सिर्फ़ ११५ कोट्स ही डाल पाया। सोच का दायरा, ज़िम्मेदारियों के साथ कम हो ही जाता है। मैं कोशिश करता था कि १२ बजे रात से पहले एक कोट् ज़रूर डालूंगा। जब ११५ कोट्स पूरे हुए तो मुझे लगा कि अब यह एक पुस्तक का रूप ले सकती है।  यह पुस्तक ज़्यादा पृष्ठ की नहीं है किन्तु जिस दुनिया में लोग सोशल मीडिया में डूबे हुए हैं, उस समाज में ऐसी पुस्तकें ही काम आती हैं और फिर यह पुस्तक प्रकाशित हुई और बिक भी रही है। अभी इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी आ चुका है और कुछ समय में गुजराती अनुवाद भी आ जाएगा।

सर्जना- सर कृपया आप अपने कॉलेज के दिनों के बारे में कुछ बातें साझा करें। आप एक यांत्रिकी अभियंता रहे हैं और आज आप एक प्रसिद्ध लेखक हैं। किस बात ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?
पीयूष सर- जी हाँ, लेखक होने के अलावा मैं एक यांत्रिकी अभियंता भी रहा हूँ। मेरा उस क्षेत्र में २५ साल का अनुभव रहा है, जिस दौरान मैंने कई सारी प्रमुख कंपनियों में काम किया है। मुझे बहुत-सी अच्छी कंपनियों में काम करने का मौका मिला और मैं यह मानता हूँ कि अगर आपके बॉस अच्छे हों तो आपका जीवन सरल होगा, ये बात तो निश्चित है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मेरे दोस्तों ने ही मुझे प्रेरित किया लिखने के लिये। मैं यह बताता चलूँ कि मैं न्यूज़ पेपर के लिए कार्टूनिस्ट भी रहा हूँ, और स्थानीय क्रिकेट मैचों में अंपायरिंग भी की है। मेरे तीन रिसर्च पेपर इंटरनेशनल जर्नल में भी प्रकाशित हुए हैं। तो मुझे अनेक तरह के कार्यों में रुचि रही है। जब मैंने भगवद्गीता लिखी (मिरर इमेज), तब मेरा अवसाद समाप्त हो गया और मैंने इस शैली को अपना ज़ुनून बना लिया और लिखने की प्रेरणा मुझे मिली प्रेमचंद जी की कहानियों से। उनकी कहानियाँ दिमाग़ से दिल में उतर जाती हैं। तो उनसे भी मुझे लिखने की प्रेरणा मिली।

सर्जना- सर हम जानना चाहते हैं कि आप किस विशेष प्रक्रिया व सोच के तहत ये चुनाव करते हैं कि आपको किस पुस्तक को ‘मिरर इमेज’ का रूप देना चाहिये? क्या इसके पीछे आपकी साहित्यिक रुचि है या कोई और कारण है?
पीयूष सर- मैंने विश्व प्रसिद्ध किताबों का चुनाव किया था जैसे कि भगवद्गीता। मेरे अनुसार सभी को भगवद्गीता पढ़नी चाहिए। पूरे विश्व में इससे बड़ी व दार्शनिक कोई और किताब नहीं है। गीता हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। मैंने गीता कई बार पढ़ी है और एक बार लिख भी चुका हूँ। और फिर से पढ़ रहा हूँ। मैंने श्री हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला पर भी ‘मिरर इमेज’ काम किया है। मैंने रबीन्द्रनाथ टैगोर जी की गीतांजलि और विष्णु दत्त जी की पंचतंत्र भी लिखी है। मैंने अटल जी की किताब मेरी ५१ कविताएँ  भी लिखी है। मेरा ये कार्य देश को समर्पित है। मैं हिन्दुस्तान को विश्व में साहित्य एवं कला के स्रोत के रूप में देखना चाहता हूँ। इन प्रसिद्ध पुस्तकों पर कार्य करने का मेरा उद्देश्य लोगों के समक्ष अपनी लेखन शैली को प्रस्तुत करना है तथा कला को बढ़ावा देना है ताकि बाकी सब भी निःसंकोच अपनी कला को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करें।

सर्जना- आप अपने जीवन में लिखने के क्रम में कभी हताश हुए हैं? मानो ऐसा प्रतीत हो कि अब सब छोड़ देना चाहिए? उस वक्त आपको ऊर्जा कहाँ से मिली?
पीयूष सर- बिल्कुल मैं भगवद्गीता लिखते समय तीन-तीन बार हताश हुआ लेकिन मुझे वह बचपन की वो कौवे की कहानी हमेशा प्रेरित करती रही कि जब वह कर सकता है तो मैं क्यों नहीं। भगवद्गीता को दो बार पढ़ने के बाद भी मुझे श्लोक अभी तक याद नहीं हैं, फिर अंततः मुझे समझ आया कि संवाद करने में ही शक्ति है इसलिए मैने संवाद करना शुरू किया। ऐसा कोई नहीं है दुनिया में जो हताश नहीं हुआ हो। चाहे अमिताभ बच्चन हो या सचिन तेन्दुलकर, हर कोई जीवन में कभी ना कभी, कहीं न कहीं, हताश ज़रूर हुए हैं, लेकिन जो व्यक्ति उस हताशा को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की शक्ति रखते हैं, जग में उनका ही नाम होता है।

सर्जना- सर, साहित्यिक कार्यों के अलावा आपकी तीन गणित की पत्रिकाएँ भी अन्तर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी हैं। कृपया आप अपने शोध कार्य और गणित में आपकी रुचि के बारे में कुछ बातें हमारे साथ साझा करें।
पीयूष सर- जी बिलकुल मैं साझा करूंगा। व्यक्ति का कर्त्तव्य निरंतर प्रयास करना है। क्योंकि मैंने भगवद्गीता का अनुवाद लिखा है तो मुझे ये ज्ञान है कि भगवान कृष्ण ने १८ दिनों तक श्लोक के माध्यम से संवाद किया था। हमारे संवाद का मुख्य उद्देश्य विश्व के हित में होना चाहिए। मेरी गणित में रुचि बचपन से थी। सभी कार्यों को परे रख मैं गणित के प्रश्नों को बनाता रहता था। सन् १९८७ में मैंने अपने गणित के शोध के बारे में अपने मित्रों को बताया तो उन्होंने इसे पत्रिका में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। परंतु मेरे शोध कार्य प्रकाशित वर्ष २०१६ में हुए। २९ वर्षों तक मैंने प्रयास त्यागा नहीं, मैं प्रयास करता रहा क्योंकि प्रयास कभी विफल नहीं होता। नीति, नियम और नीयत, ये तीनों व्यक्ति को सफलता की मार्ग पर अग्रसर करते हैं। मैंने अपने शोध में तीन विषयों पर कार्य किया है; ‘फैक्टोरियल फंक्शन’ , ‘एरिया ऑफ ट्रैपिजि़यम’ और एक नई प्रमेय पर काम किया है।

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सर्जना- सर आपने तकनीकी क्षेत्र में कार्य किए हैं, आप बहु-आयामी प्रतिभा के धनी हैं, तो आपके जीवन में व्यस्तताएँ भी बहुत होती होंगी, आप अपनी रूचियों के लिए समय कैसे निकालते हैं?
पीयूष सर- आपने बचपन में आपने बचपन में कौवे के मटके में कंकड़ डाल कर पानी ऊपर करने की कहानी तो सुनी ही होगी, वह है एक पंछी और मैं एक इंसान। अगर एक कौआ अपनी बुद्धि का इतना सुन्दर उपयोग कर के पानी पी सकता है तो मैं किताब क्यों नहीं लिख सकता, इसी सोच को दिमाग़ में रखते हुए इस कहानी से प्रेरित होकर किताब लिखने की आप शुरूआत कर सकते हैं। आपके दिन में २४ घंटे हैं। मान लीजिए ८ घंटे आप जॉब में व्यतीत करते हैं और २ घंटे आपको आने जाने में लगे। बचे १४ घंटे, जिनमें से ७ घंटे आप सोने में लगाते हैं। बाक़ी ७ घंटों का जो समय है उसमें आपको परिवार, बच्चों, मित्रो और अपने लिए ख़र्च करना है, तो आपको एक संतुलन बनाना पड़ेगा। और कौवे की कहानी के अलावा मुझे दो पंक्तियों बहुत प्रेरित करती हैं, पहली है श्री मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ ” नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो”, एवं दूसरी है रॉबर्ट फ्रौस्ट की लाइन” आई हैव माइल्स टू गो, बिफोर आई स्लीप”। इन दोनों बातों ने मुझे प्रेरित किया और मैं मानता हूँ कि अगर मैं अच्छा हूँ और सच्चा हूँ, और भगवान का आशीर्वाद हो, तो पुस्तक एक न एक दिन ज़रूर पूरी होगी। मेरा नियम है कि मैं हर एक चीज़ की स्टडी करता हूँ और उसके बाद ही उस पर काम करना शुरू करता हूँ, और उसे अंत तक ले जाता हूँ, ये मेरी प्रतिबद्धता है।

सर्जना- आजकल की युवा पीढ़ी जो साहित्य से दूर होती जा रही है, उनके लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
पीयूष सर- यह बहुत कष्टकर सवाल है। आज के युग में सोशल मीडिया साइट्स जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब पर कोई तस्वीर या वीडियो अपलोड करके युवा इसी चिंता में सुबह से शाम कर देता है कि उसके फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स कितने बढ़े। युवा पीढ़ी का साहित्य से दूर होने का मूल कारण है सोशल मीडिया साइट्स का दुरूपयोग करना। मेरा आज के युवाओं के लिए यह संदेश है कि समय का सदुपयोग करें। जो हमारे माता-पिता को प्रकृति से मिला, वह हमें नहीं मिला और जो हमें मिला वह आनेवाली पीढ़ी को नहीं मिलेगा।

सर्जना- कोरोना वैश्विक महामारी में हम देख रहे हैं कि लोगो में सकारात्मक सोच की कमी हो गई है, कई लोग जीवन से मायूस हो गए हैं, तो ऐसे लोगों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे, ताकि उनमें वो ऊर्जा वापस आ सके?
पीयूष सर- ये कोरोना काल हम सभी के लिए बहुत कष्टदायक रहा है। बीते कुछ महीने अत्यंत कष्टदायक थे मेरे और मेरे परिवार वालों के लिए और लगभग समस्त विश्व के लिए भी। इसलिए मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इस श्राप से हम सबकी रक्षा करें। इसमें हमने अपनों को खोया है, साथ ही देश-भर की आर्थिक व्यवस्था भी बहुत ख़राब हुई है। लेकिन हम लोगों को फिर से उसी प्रगति की पटरी पर लौटना है; दोबारा मेहनत कर फिर से बढ़ना है वापस उन शिखर की ऊँचाइयों को हाशिल करना है। दोबारा क्योंकि भले ही सफर में कितनी ही कठिनाइयॉं आएं हमें अपना मनोबल नहीं खोना चाहिए। मैंने एक पोस्ट लिखा था “सुख और दुःख में अक्षर ‘ख’ को देखो जो दोनों में एक सा दिखता है। सुख में व दुःख में ‘ख’ की बनावट में कोई अंतर नहीं है। वो सुख में भी साथ है और दुख में भी, तो हमें विचलित होने की जरूरत नहीं है। अक्षर ख की तरह ही दोनों परिस्तिथियों में समान रहना चाहिए। ऐसे अप्रिय चीज़ें जिंदगी में आती हैं, इनसे सीख कर खुद को संतुलित बनाने की कोशिश करें, क्योंकि मनुष्य का काम आगे बढ़ना है। हमारे जान-पहचान के बहुत सारे लोग हमें छोड़कर चले गए हैं; इसका शोक हम सभी को है, परंतु मैं आप सभी से यही कहना चाहूँगा कि ईश्वर से प्रार्थना करें और उन पर विश्वास करें। अपने मनोबल को बढ़ाएं रखें। बस यही संदेश देना चाहूँगा की आप खुद को संतुलित रखें।

सर्जना- सर सर्जना के लिए आप कोई संदेश देना चाहेंगे?
पीयूष सर- नाम ही इतना प्यारा है सर्जना! मैं आपको ये बता दूँ की जब मैं आपके संपर्क में आया और मुझे सर्जना में संवाद  करने को कहा गया तो मैं थोड़ा भावुक हो गया था, मुझे इतने प्रतिभावान लोगों के समुह से संवाद करने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसमें सभी अति विनम्र और सहज लोग हैं, इसलिए मैं आप लोगों से बातें किए जा रहा था। आप सभी बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं, इसे ऐसे ही और आगे तक लेकर जाएं और इस परिवार को ऐसे ही बना कर रखें। इस सर्जना समुह को अनेकों ऊँचाईयों तक लेकर जाएं। आप अपनी मैगज़ीन और वेबसाइट के द्वारा अनेकों लोगों से जुड़ें और उनके विचारों को सभी तक पहुंचायें।

धन्यवाद सर। आपका तेजस्वी व्यक्तित्व देखकर हम सभी हृदय से अभिभूत एवं तृप्त हैं। हमारे जैसे तकनीकी संस्थानों में पढ़ रहे कई छात्र-छात्राओं के लिए आप प्रेरणा के एक ऐसे स्रोत हैं जो नित ही साहित्य के प्रति हमारी रूचि को एक नई उड़ान देगा कि कैसे हम अपनी तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ अपनी रूचि-अभिरुचि को भी एक नई दिशा दे सकते हैं। आपके बहुमूल्य शब्द व अनुभव उन सभी छात्रों के लिए मार्गदर्शन का काम करेंगें जो अपने जीवन में कुछ अलग, कुछ नया करने की चाह रखते हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक भी आपके अनुभवों को पढ़कर व जानकर बेहद प्रसन्न व अभिभूत होंगे। सर्जना परिवार की ओर से एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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