इक रोज यूँही
नापूँगा क्षितिज तुम्हारी आँखों का
भीतर संजोया है तुमने
हाड़ माँस से बने शरीर में
गूढ़ अवचेतन रहस्य कई,
तय करूँगा
परिचय से प्रेम तक के
अपरिमित छोरों का सफर।

लूँगा उड़ान उधार
बसंत में नहाए विहग से
उड़ूँगा पंख पसार
घेरूँगा ज़मीं उतनी
सिमट आए जिसमें
बिखरे अधूरे स्वप्न मेरे।

निहारूँगा आँखों में बसा चाँद तुम्हारे
वो अकुचाकर उसका
छुपना बादलों की ओट में
प्रतिपल परिवर्तित होकर
नभ से आँख मिचौली करना,
करना कभी निज अनुसरण
पिघला देना खुद को कभी
इक रोज मेरी बाँहों में।

आना इक रोज तुम बन रश्मिरथी
चढ़ किरणों की पालकी
उतरना मेरे हृदय धरा में
हर लेना अँधियारा मद्धिम मद्धिम
उस रोज मुझे मिल जाएगा
सूर्योदय तुम्हारी आँखों में।

~अनिल कुमार, वैद्युतिकी अभियंत्रण

सत्र-२०११

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