दीये जलाएं…

कंठ खोल ,सुर नही, स्वर की गति को थामा हैं। उल्लास मन कुछ बोल पाए यह उदास मन ने न माना हैं। हर क्षण ये चिर मन के, रंग ही फीके पड़ गए। हम बच्चे ही अच्छे थे, यूँ ही क्यों आगे बढ़ गए। ये काल के कपाल की चाल से, सब रुसवाई है , … Continue reading दीये जलाएं…

दार्जिलिंग: पहाड़ और शांति

ऊपर आकाश, नीचे आकाश बीच में थोड़ी जमीं बची थी जहाँ अचंभित खड़ा था प्रखर प्रकाश !!! ऐसा लग रहा था मानो यथार्थ की कड़वाहट, रोज़ के कोलाहल को छोड़ किसी काल्पनिक दुनिया में आ पहुँचा हूँ, हक़ीकत में कहीं ऐसा होता है भला ?, ऐसा लग रहा था मानो सोनपरी ने अपनी अन्य नन्ही … Continue reading दार्जिलिंग: पहाड़ और शांति

बाबा, मेरे उत्तर…

बाबा, कुछ सवाल पूछूँगी। जवाब दोगे ना ? बोलो! दोगे न ? क्यों पहनते हो वही इक कुर्ता होली और दिवाली में ? क्यों सर्दी में नहीं पहनते भैया-से जूते ? क्यों आते हो रात को देरी से ? जबकि शाम तक ही रहता ऑफिस तुम्हारा। क्यों अब स्कूटर से नहीं जाते काम पर, और … Continue reading बाबा, मेरे उत्तर…

बिटिया की पाती:माँ के नाम

माँ, कल मैं अलमारी साफ कर रही थी । हाँ, कर लेती हूँ अब,आप जो नहीं हैं मेरे पास। अलमारी में उमड़े तूफ़ान से लड़ते लड़ते थक कर सुस्ताने बैठी तो आप ही जेहन में थीं।कितना आसान था सबकुछ, सारी उधेड़बुन से निकलना ,चाहे वो अलमारी की बात हो या मुश्किलों की... और न जाने … Continue reading बिटिया की पाती:माँ के नाम

तुम गए नहीं

उस आखिरी शाम, ‌तुम्हारी उंगलियाँ मेरे पसीने से नम हाथों से ‌फिसल तो गईं ‌लेकिन, ‌तुम गए नहीं। ‌ तुम्हारी कमीज का वो बटन , ‌हर सवेरे जो कमजोर हो टूट जाता था, ‌आखिरी दफा ‌पक्के धागे से सिलकर ‌चला गया था, ‌लेकिन , ‌तुम गए नहीं। ‌ ‌सदियों से मेज पर सजती दो प्यालियाँ … Continue reading तुम गए नहीं

अनगिनत रंगों की फुहार-रेनबो ‘१८

  कहते हैं किसी देश का विकास उसके नौनिहालों से होता है। हम उन्हें जिस तरह के संस्कारों से सींचेंगे देश उसी राह मे बढ़ेगा । बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ अन्य गतिविधियाँ भी आवश्यक है।इसी कड़ी में प्रयास इंडिया की ओर से हर वर्ष रेनबो का आयोजन होता है जोकि … Continue reading अनगिनत रंगों की फुहार-रेनबो ‘१८