दंश-उत्सव

संगीत जीवन का बजता है चारों ओर, जीने का उल्लास बिखेरती है माँदर की थाप, आदिम संस्कृति का यह उद्घोष में पहचान है आदिवासी मानुष की । रंग-बिरंगी भूषा में, नृत्य की लयकारी, जैसे धरती भी थिरकती हो, अपनी सबसे प्रिय संतानो के सँग मगर हो सकता है यह सबकुछ बस एक ज़रिया हो, भूल … Continue reading दंश-उत्सव

हूल..

जब, कसने लगी थी वो शासन की जंजीर गोलियों से भिड़ गए आदिवासियों के तीर ।। "आदिवासी अन्याय सहेंगे" अंग्रेजों की ये भूल थी और वहीं से फूट पड़ी प्रथम रश्मियाँ हूल की ।। जंगल-जंगल सभी ओर बस यही सुनाई देता था "अंग्रेजों ! बहुत हुआ" पत्ता-पत्ता कह देता था ।। सिद्धो-कान्हो ने तीर से … Continue reading हूल..

माँ, याद तुम्हारी आती है

इस कमरे का एकाकीपन तन्हा है यह मेरा मन इस अंधियारे में तेरी याद यादों के दीप जलाती है, माँ, याद तुम्हारी आती है। पास के छत पर माँ कोई गोद के मुन्ने में खोई, कोमल थपकी दे-देकर जब लोरी कोई सुनाती है, माँ! याद तुम्हारी आती है। जब गर्म तवा छू जाता है हाथ … Continue reading माँ, याद तुम्हारी आती है

A letter to my younger self…

प्यारी दीक्षा, हाँ जानती हूँ तुम्हारा नाम कुछ और है, पर तुम भी जानती हो कि यही तुम्हारा नाम है। तुमसे मिलने का दिल तो बहुत करता है पर क्या करूँ? न वक्त है और न ज़रिया। जानती हूँ कि जब तुम जानोगी कि मैं कौन हूँ तो कई सवालों के जवाब माँगना चाहोगी मुझसे … Continue reading A letter to my younger self…

कि यादें जुड़ गई है तुमसे ….

कि यादें जुड़ गई हैं तुमसे , वैसे तो तुम कुछ ख़ास पसंद नहीं थे मुझे , पर अब जब तुमसे दूर जाने की सोचता हूँ , तो मन बेचैन सा हो उठता है | बेपरवाह होना तुमसे सीखा , और सीखी तुमसे रुहानियत , आँखें झुकाने से सर उठाने का सफर , भी तो … Continue reading कि यादें जुड़ गई है तुमसे ….

बदलती होली…

होली आती है, पहले की भाँति तो नहीं लेकिन दिनभर के लिए रह ही जाती है। बाज़ार माह भर पहले से नहीं लेकिन सप्ताह पहले सज ही जाते हैं। और पिताजी दो दिन पूर्व भागदौड़ में सही पकवान की सामग्री ले ही आते हैं। सामग्रियों में अब पिचकारियाँ नहीं रहती। विषाद का विषय है, लेकिन … Continue reading बदलती होली…