श्रीमुख मंगल आदिदेव का
जन-गण-मन के नायक जो
करें वंदना सत्कर्मों से
इस त्रिगुणी के हैं भावक जो
वह श्रीमुख ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

शीश नवा हम श्रीगणेश को
उस भुव्यादिशक्तिकायज को
शुचिता वाणी में जो बसती
ललिता वाणी की कर्त्री को
वह ललिता ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

वैदेही के मानस चेतन
दिनकर-आलम्बन रघुवर को
काव्यहृदय में नित्य बसे जो
दिक्-अम्बर-भूषण-उर-धर को
वह वैदेही ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

धारण करती जो वसुधा है
पालन करता जो अम्बर है
पञ्चभूत में रची-बसी जो
दिव्या मायावी सृष्टि को
वह सृष्टि ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

मानवता की प्राण शिखा सम
जो मेरुदण्ड कृतचेतन का
नमन कर स्वाधीन भाव से
निज भाषाभू के उद्भव का
वह प्राणशिखा हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

भारत के जन-मन-जय की
धरती पर अमृत-सञ्चय की,
तमोराशि को हरने वाले
जीवन में पुण्य-वलय की
वह ज्वाला ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

युगों-युगों से राह बनाती
कालवृक्ष की शाखाओं-सी,
शङ्करशेखर से जो उतरी
मंदाकनी के दिव्य सरित्-सी
वह धारा ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

देववाक् है जिस का उद्गम,
जीवन का जो है उद्गाता,
संघर्षों के पथ से हो कर
सदय काल ने जिसे सँवारा
वह पुत्री ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

भारत भू की दिव्य भारती
मन चक्षु को जगमग करती
प्रखर प्रभा से उद्भासित
जनमानस को ऊर्वर करती
वह मेधा ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

सञ्चित पुण्यों का प्रकाश यह
आनन्दोद्गम महाकाश यह
करूणावलयित दिव्य वास यह
नारायण का चिर निवास यह
वह स्वयंप्रभा हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

जीवन की है अमिट श्वास यह
देवों की गरिमा से मण्डित
शवभूतरुद्र अवरूद्ध विकल
वामासृष्टि का महाश्वास यह
वह वायु ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

परा वाक् इस का उद्भावन
पश्यन्ती है प्रस्तारण
वाक् मध्यमा सञ्चारण
और वैखरी उन्मोचन
वह वाणी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

स्वर-व्यञ्जन का वसन है पहने,
विसर्ग-यमों के अङ्गवस्त्र हैं
नासिक्य बने हैं जिस के कंकण,
जो अनुस्वार श्रृंगार करे
वह कमला ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

ह्रस्व दीर्घ प्लुत इस का मापन
अर्धकाल का भी अनुचालन
स्वरित सहित हैं तीन विभाग
करती गीता का जो पालन
वह वाची ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

कंठ तालु मूर्धा जिह्वा और
ओष्ठ बने जिस के आसन
संकल्पित निज वेग से उठते
वायुपाद से करे लास्य जो
वह गौरी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

बाह्य एकादश पाँच आभ्यंतर
यत्नों से वर्णों को रचती
शुभ्र शुभंकर उच्चारण से
प्रणवद्वार नित नूतन रचती
वह ब्राह्मी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

सुन्दर छन्द गति को साधे,
व्याकरण आनन है इस का
मुखर भाव से काव्य रचे यह
वाह करे जो दिव्यरसों का
वह सरसा ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

गद्य, पद्य आँखें हैं जिस की
मन्त्र विचार उच्चार अवलोकन
विभाव भाव अनभुाव में बसते
दस रस हैं जिस के आलोड़न
वह चितिशक्ति हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

काव्य कथा ही पद हैं जिस के
जिस के कर हैं गायन दर्शन
उर आलोक बसा श्रुतियों का
पालन करती जन-मन-चेतन
वह विष्णुप्रिया हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

कथालोक में मुक्त विचरती
काव्यसुुुधा से तृप्ति करती
गीतगति से तन-मन हरती
विश्वाक्षर मधुरा कल्याणी
वह लब्धि ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

वेदों की वह आदि लहरी
उपनिषदों की स्वर सरिता
इतिहास पुराणों की गम्भीर
गिरा रही जिस की थाती
वह सुधी हृदय हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

निर्मल रामायण, कृष्णकथा
भारत जीवन की जय गाथा
सरितासागर उद्बुद्ध कथा
मथती जिस को निशदिन हैं
वह शुद्धि ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

महावीर की चेतन वाणी
गौतम की अभिनव सम्बोधि
कोटि कोटि सन्तों की वाणी
यह शतबल जिस में व्यापा है
वह सदासिद्ध हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

आदिकवि के ऋत की धरणी
व्यासकवि के सत्य की भरणी
महाकवि जो कालिदास हैं
उन के अद्भुत काव्य की करणी
वह धरती ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

तलुसी मीरा सूर कबीर
जिस के प्रांगण में हैं खेले
उन के कानों में है जिस ने
शाश्वत सुन्दर काव्य उड़ेले
वह चिरकविता हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

जायसी केशवचन्द्र बिहारी
जिस के कानन के हैं विहारी
चिन्तामणि भूषण और दादू
उनके सङ्ग बने प्रतिहारी
वह कानन ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

भक्ति काव्य की निर्मल धारा
सगुण अगुण की संहित धारा
नाथ, योग ये अगणित पन्थ
गोरख आदि का जो सहारा
वह चिरधारा हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

भारतेन्दु, महावीर, मैथिली
प्रसाद, प्रेम-से अगणित योद्धा
जिस छवि के भ्रू के इंगित पर
सर्वस्व निछावर करते हैं
वह दिव्यछवि हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

माखन, दिनकर, सूर्य, सुभद्रा
अज्ञेय सरीखे उन्नायक
रेणु, मलयज, मुक्तिबोध हैं
जिस देवी के किंकर सेवक
वह महीयसी हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

रमेश, नन्द, निर्मल, गोविंद
जिस के सन्नद्ध धनुर्धर हैं
महादेवी, यशदेव, सुमित्रा
जिस रणकर्त्री के परिकर हैं
वह रणचण्डी हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

कालगति की दुर्मुख माया
निर्मल छवि पर शत्रु काया
वर्ष सहस्रों से है छायी
जन-मन-चेतन जो भरमायी
वह छवि ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

अमर्ष हृदय के चतुर प्रहार
विकट विकटतर बारम्बार
इन के सम्मुख स्थिर होकर,
जो  संचेतन सम अड़ी रही
वह अचला ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

दुर्वह शासन दुर्दांत विदेश
पहले मोगल फिर आंग्ल देश
होता भारत पर विषम वार
घायल मानस वह परम शेष
वह मानस ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

भारत मन के महाकाश पर
रात अँधेरी घिरकर छायी
जन-जन की उस अधोगति में
सबल बनकर फिर जो आयी
वह द्युति ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

रही सदा से यह आधुनिक
देशकाल के दुःख से दुःखिता
आसिन्धु देश को जोड़ा इस ने
देश के मन से जन का नाता
वह सूत्री ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

निज भाषा की उन्नति में ही
देशकाल की गति का मूल
दास मनों के उद्बोधन का
यह महामन्त्र जिस ने फूँका
वह मन्त्री ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

गाँधी ने पायी जन की वाणी
जनमन कुञ्जी उस ने जानी
गुर्जर प्रान्त का रहनेवाला
हिन्दी को ही उस ने जाना
वह कुञ्जी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

दयानन्द का शास्त्रोद्धार
करता बेड़ी भीषण प्रहार
शास्वत भारत का अमर ज्ञान
करता फिर हो उन्मुत्त विहार
वह ज्ञानी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

दाग दासता के धोने को
निज शासन के कर गहने को
देशकाल को मुक्त करे जो
धधकायी जिस ने वह ज्वाला
वह सविता ही हिन्दी है
इस को नमन कर हम।।

पूरब से पश्चिम उत्तर दक्षिण
मही से अंबर पाताल लोक
उमड़ा जनजन अतुलित अछोर
जयघोष गूँजा गर्जन अतिघोर
वह गर्जन ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

प्रखर भारती के पैनै शर
होते रह-रहकर भीषणतर
अपने अपनों की बलि देकर
हम हुए स्वगत निजशासनकर
वह बलि ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

हुए स्वगत निजशासनकर पर
हाय आत्मा रही अलक्षित
अपने शासन में ही बढ़कर
हम सहे तितिक्षा सर्वाधिक
वह आत्मतत्त्व हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

विधि का कैसा खेल रहा यह
पहले सहते विजय विदेशी
दासपाश से मुक्ति पाकर
अब हैं सहते हार स्वदेशी
वह सहनशक्ति हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

अब स्वजनों के चरणप्रहार
वे होते प्रशिक्षण भीषणतर
अपनी भाषा को छल-छल कर
वे पाते हैं सुख नूतनतर
वह दलिता ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

आंग्ल दमन से मिली मुक्ति थी
अँगरेजी पर बढ़ती-चढ़ती
छूटी अब तो शिक्षा-दीक्षा
उदरम्भरि भाषा की भिक्षा
वह भिक्षुणी ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

अपने ही लोगों का रोध
प्रतिपल संवर्द्धित होता है
पल-पल रचते वे नव माया
शत शत छल जिसमें बसता है
वह छलिता ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

दुःख इस का सागर से गहरा
हाय नहीं पर इस की चिन्ता
व्यथा लिखी पर्वत से ऊँची
नहीं कहीं पर इस का लेखा
वह दुःखिता ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

कैसे हो कि लेख काल का
फिर होवे अनुकूल हमारे
हम से ही वे फिर जुड़ जाएँ
जो अब तक प्रतिकूल हमारे
वह द्रष्टा ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

अपनी ही हो शिक्षा-दीक्षा
अपनी ही वाणी रहती हो
विज्ञान हो या कि हो दर्शन
सब अपनी भाषा कहती हो
वह स्वप्ना ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम ।।

इस का पाठ करें हम निशिदिन
निश्चित अपना कृत्य करें हम
अपनी भाषावट छाया में
अपनी वाणी नित्य वरें हम
वह निश्चय ही हिन्दी है
इस को नमन करें हम।।

-कुमार सौरभ
धात्विकी अभियंत्रण
सत्र-१९९६

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