कुछ विचार कौंधे
खाली पड़े दिमाग में
सोचा क्यूँ ना कविता का रूप दूँ इसे,
आवाज लगाई हिंदी को
काफी ढूँढा
जाकर मिली सुनसान खंडहर में
खटिया डाल पसरी हुई थी कोने में,
क़दमों की आहट से घबराकर जाग उठी
हैरान मैं, पूछ बैठा
यूँ निट्ठली क्यूँ पड़ी हो?

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बौखला उठी हिंदी,
रास नहीं आया उसे मेरा निट्ठली कहना
झुँझलाकर कह बैठी-
कस चुके हो मेरे जुबाँ पर लगाम
ड़ाल चुके हो मेरे पैरों में बेड़ियाँ
छीन चुके हो मुझसे मेरी अभिव्यक्ति
बस सूली पर चढ़ाना शेष है।

मान बैठे हो तुम
एक ऊब सी मुझे
भाषाओं की भीड़ में,
कड़वी भी लगती हूँ चखने में,
गुमनाम भी घोषित कर चुके हो मुझे,
मान चुके हो मृत मुझे
छोड़ चुके हो ऊँगली मेरी,
भूल चुके हो मेरी अहमियत तुम।

मैं हूँ वही बूढ़ी बरगद का पेड़
सुस्ताते हो तुम जिसकी छाया में
होते हो जब दिखावेपन से दूर,
मौन हूँ मैं, मृत नहीं
विस्तार हूँ व्योम का, लघु वृत नहीं।

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लेटी रहती हूँ उदास
अँधेरी रातों में,
कातती हूँ, बुनती हूँ
अपने हिस्से की चमक,
कभी जब उदास होंगी रातें तुम्हारी
या थम जाए अन्य भाषाओं का आसमाँ,
थाम लेना ऊँगली मेरी,
अनकटी रातों के नभ से
चमकूँगी तुम्हारे हिस्से का चाँद बनकर।

 

– अनिल कुमार

२०११ बैच, सर्जना

#हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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