अगर हारना भी एक चुनाव होता
तो शायद दसों दिशाएँ नहीं देखता
पलायन की खोज में,
बस रुक जाता,
और मूँद के रखता अपनी आँखों को
उस पल तक
जो केवल अंधकारमयी है।
प्रकाश की किरण जब तक है
हार का संकल्प पूर्ण नहीं हो सकता।
पक्की हार भी किसी जीत की तरह है
जिसमें दोनों या तो शून्य है
या फिर दोनों एक।
अगर हारने पर भी स्वाभिमान कायम रहता
लज्जा मीठी लगती,
तो हारता उस पल तक
जहाँ जीत की चीखें भी गुमनाम होती।
नाकामी से मिले परिहासो,
परिवादो को,
एक मधुर संगीत में पिरोकर
मैं सुनता उसे
मुस्कुराकर, मरणकाल तक।
मन प्रयोजन ढूँढता है
हर चीज के होने में,
तारों के होने से रातें कम अंधेरी नहीं होती
न कोई पथ उज्ज्वल होता है,
पर उनका चमकना
असंख्य कहानियों का हिस्सा जरूर होती है।
अगर हारना मेरा चुनाव होता,
तो संभावनाओं के विपरीत
मैं चुनता खुद को,
अपने स्वाभिमान को,
पथ पर साथी हो, न हो
पड़ाव सुखावट हो, न हो
क्या मन की आधी
या तन पर व्याधि
मैं बढ़ता,
और बनता पथिक, अपनी मंजिल का।

बहुत सुन्दर !
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