बाबा, कुछ सवाल पूछूँगी।
जवाब दोगे ना ?
बोलो! दोगे न ?

क्यों पहनते हो वही इक कुर्ता
होली और दिवाली में ?
क्यों सर्दी में नहीं पहनते भैया-से जूते ?
क्यों आते हो रात को देरी से ?
जबकि शाम तक ही रहता ऑफिस तुम्हारा।

क्यों अब स्कूटर से नहीं जाते काम पर,
और बाबू के लिए ले आये हो नई साइकिल
नया कूलर ले आये हो, कहते हो गर्मी बहुत है
फिर क्यों नही बैठते कभी वहाँ ?

बहुतेरे सवाल हैं बाबा।
तुम ही तो बचपन में कहते थे न,
जितने भी सवाल हों, जैसे भी हों
जब कोई न उत्तर देगा,
तेरे बाबा जरूर देंगे ।
लेकिन जब भी पूछती हूँ – “क्यों करते हो ऐसा ?
क्यों नहीं सोचते अपने बारे में ?
क्यों नहीं खर्चते खुद पर कभी ?”

बिना किसी जवाब के
निकल जाते हो कमरे से
भले तुम न बताओ बाबा,
समझती है तेरी गुड़िया सब
त्याग तुमने भी किया है,
बस गणना नहीं हुई
तुम्हारे त्याग की,
तुम्हारे वातसल्य की,
तुम्हारे प्रेम की,
क्योंकि,
तुम्हें छिपाना आता था
गुस्से की लकीरों में,

कोमल मनोभावों को ।

मुझे पता है

तुम बहुत प्यार करते हो सबसे

बस कहते नहीं,
और इसलिए नहीं देते
अपनी गुड़िया के प्रश्नों के उत्तर
और बस छोड़ देते हो
शब्दों से अनुत्तरित।
मात्र शब्दों से…

2 thoughts on “बाबा, मेरे उत्तर…

  1. “क्यों पहनते हो वही इक कुर्ता
    होली और दिवाली में ?”

    बहुत सुंदर!! पिता के त्याग का अद्भुत चित्र!!👌

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