नव-सर्जना

कल ढली शाम अलग थी, आज सुबह का रूप अलग है बह रही थी जो मंद-मंद कल तक, आज हवाओं का रुख अलग है डूब गया था जो अंधेरे में आज, सूरज की धूप अलग है। यह सुबह नई शुरुआत है नव-भारत के सृजन की राष्ट्र के निर्माण को, भारत-समुद्र के मंथन को। सुनो हुंकार … Continue reading नव-सर्जना