कुछ भाव ऐसे होते हैं जिन्हें समय भी बदल नहीं पाता। लालच, काम, क्रोध, ईर्ष्या, प्रेम और करुणा का प्रभाव आज जितना है, उतना ही पहले भी था। यही कारण है कि मुंशी प्रेमचंद की रचनाएँ आज के पाठकों में भी प्रचलित हैं। उनकी ‘गोदान’ और ‘निर्मला’ हर साहित्य-प्रेमी की पाठ्य-श्रृंखला का हिस्सा हैं। उनके पात्र आज, दशकों बाद भी, हमारे हृदय के अंतरतम भाग को स्पर्श करने में समर्थ हैं।
मुंशीजी की कलम से जन्मी ऐसी ही एक और रचना है ‘प्रेमाश्रम’। १९२२ में लिखा गया यह उपन्यास उस समय के भारत की सामंती व्यवस्था और प्रजातंत्र के वास्तविक स्वरूप को उजागर करता है। इसमें अन्नदाता किसानों का जमींदारों और अफसरशाही के हाथों दमन अत्यंत प्रभावी और मार्मिक रूप से चित्रित किया गया है। जो किसान राष्ट्र का पेट पालते हैं, उन्हें कभी लगान, कभी सूद, तो कभी बेगार में फँसाकर शोषित किया जाना यह दर्शाता है कि जिस कृषि को हमारे शास्त्रों में सर्वोत्तम कहा गया था, उसे अंग्रेज़ी शासन ने किस प्रकार दरिद्रता और दुर्बलता का पर्याय बना दिया था।
यह उपन्यास सामंत-समुदाय के पहलुओं को भी एक पृष्ठभूमि प्रदान करता है। उनके विचार, आशाएँ, पारिवारिक और सामाजिक समीकरणों को इसमें विस्तृत रूप से दर्शाया गया है। इस कहानी का मुख्य पात्र ज्ञानशंकर आदर्श और लोभ के अंतर्द्वंद्व का प्रतीक है। उसकी उच्च शिक्षा और कुलीन परवरिश उसे जीवन में सही और गलत का भेद तो बताती है, किंतु उसकी आत्मा इतनी सशक्त नहीं होती कि उसे कुपथ पर जाने से रोक सके। परिणामस्वरूप, वह अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए जालसाजी और हत्या जैसे जघन्य अपराधों से भी पीछे नहीं हटता। ऐसा नहीं है कि उसकी चेतना पूर्णतः मृत है। ऐसे कई क्षण पाठकों के सामने आते हैं जब उसे अपने कृत्यों पर घृणा होती है। माया के बंधनों को तोड़कर उसके हृदय की गहराइयों में छिपी वेदना और पश्चाताप हमारे सामने आते हैं। परंतु दुर्भाग्यवश, उसके मन में बसा लोभ उसके सभी सद्भावों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
गायत्री, जो ज्ञानशंकर की पत्नी की बड़ी बहन है, इस उपन्यास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वैभव से परिपूर्ण होकर भी उसने सदैव आत्मा की ऊँचाई को अधिक महत्व दिया; परंतु उसकी अपार संपत्ति ने कई शत्रुओं को जन्म दिया। जिन पर उसने सर्वाधिक विश्वास किया, उनसे भी उसे केवल विश्वासघात ही प्राप्त हुआ।
एक ही कुल और सामाजिक व्यवस्था में ज्ञानशंकर के बड़े भाई प्रेमशंकर भी पले-बढ़े थे, पर उनकी सोच और सिद्धांत ज्ञानशंकर से बिल्कुल विपरीत थे। उन्होंने मनुष्यता को हर प्रकार की विलासिता से ऊपर रखा। जिन दरिद्र किसानों को सरकार और शिक्षित वर्ग ने पशुवत जीवन जीने के लिए छोड़ दिया था, उनके बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान करना उनके सिद्धांतों की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
उपन्यास में ज़मींदारी के साथ-साथ अफसरशाही द्वारा भी समाज के दमन को बखूबी दिखाया गया है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए था, उसका अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा देश को खोखला करने के लिए उपयोग किया जाना पराधीन भारत के दुर्भाग्य को प्रकट करता है। बेगार और रिश्वत जैसी कुरीतियों का ग्रामीण भारत पर कितना गहरा प्रभाव था, इसे इस उपन्यास के माध्यम से समझा जा सकता है। ऐसे ही एक अफसर ज्वालासिंह इस कहानी के प्रमुख पात्रों में से एक हैं। उनकी नौकरी उनसे निष्ठुरता की माँग करती है, ताकि वे हर हाल में सरकारी खजाने को भर सकें। परंतु उनकी आत्मा इतनी पतित नहीं है। कर्तव्य और मूल्यों का टकराव तथा प्रेमशंकर का उनके जीवन पर प्रभाव उपन्यास के रोचक पहलुओं में से एक है।
उपन्यास में कर्तव्य और मूल्यों का यह द्वंद्व केवल ज्वालासिंह के चरित्र तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अगली पीढ़ी में मायाशंकर के माध्यम से भी प्रत्यक्ष रूप से सामने आता है। पिता अपने पुत्र के शरीर का जनक हो सकता है, परंतु उसकी आत्मा, उसके विचार और उसकी पहचान उसकी अपनी होती है। मायाशंकर तन से भले ही ज्ञानशंकर का पुत्र था, किंतु उसकी आत्मा को उसके चाचा प्रेमशंकर ने सींचा था। उसके भीतर वही करुणा और मानवता प्रवाहित होती थी, जो उसकी माँ और चाचा में भी विद्यमान थी। यही कारण है कि मायाशंकर के संस्कारों के सामने हर धन-संपत्ति तुच्छ प्रतीत होती है।
उपन्यास में अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं, जहाँ कथा अप्रत्याशित दिशा लेती है, किंतु इसका अंतिम भाग सबसे अधिक प्रभाव छोड़ता है।यह हिस्सा केवल ज्ञानशंकर के व्यक्तित्व को ही नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन-दृष्टिकोण को भी जटिल रुप से उजागर करता है। जिस धन-संपत्ति के लिए उसने नीति-अनीति की सीमाएँ लांघ दीं, वही अंततः उसके जीवन के अर्थ पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
-जीत प्रकाश
