बनारस की तो बात ही निराली है। अपवादों का शहर, घाटों का शहर, ज्ञान और ज्ञानियों का शहर है यह बनारस।
इसी बनारस के एक विश्वविद्यालय के ‘भगवान दास’ नामक छात्रावास के छात्रों की कहानी है- “बनारस टॉकीज़”। यहाँ भविष्य के वकील और वर्तमान के छात्र रहते हैं। जब कैम्पस में होते हैं तो एक दूसरी ही दुनिया में जी रहे होते हैं जिन्हें कैम्पस के बाहर की दुनिया का भय भारत के तमाम दूसरे छात्रों की तरह आखि‍र में सताता है।
हालाँकि दूसरे छात्रों की दुनिया भी उससे अलग नहीं है। छात्रों का हॉस्टल में आना, एक दूसरे से मिलना, दोस्त बनना यह आम बात है जो कई दूसरे कैम्पस में भी होती हैं। लगभग प्रत्येक कैम्पस में कुछ दोस्त जय-वीरू की तरह भी होते हैं। ऐसे ही दोस्तों में अनुराग डे, जयवर्धन, संजय, राम प्रताप दूबे, राजीव पांडे शामिल हैं। पूरे उपन्यास में इन सभी की उपस्थ‍िति लगभग बनी हुई है।
इस उपन्यास की भाषा पूरी तरह बनारसी पुट लिए हुए है। छात्रों के छात्रावास में नामांकन की प्रक्रिया से कहानी की शुरुआत होती है। रैंगिंग के किस्से, गर्ल्स हॉस्टल की कहानियाँ, कैम्पस के गॉसिप्स, कैम्पस की लव स्टोरी, लड़कियों के छात्रावास की कहानियाँ आदि बड़े ही मनोरंजक ढंग से युवाओं के नज़रिये से कही गई है। कहानी में नायक के रूप में संजय है जो उपन्यास के सूत्रधार भी है। शिखा उसकी दोस्त है और एक प्रमुख पात्र भी।

बनारस टॉकीज़

शुरुआत में ही लेखक ने हास्य रंग घोला है जो चेहरे पर न रुकने वाली हँसी देती है…बानगी के तौर पर आगे की कुछ पं‍क्त‍ियों को पढ़ें…

“कमरा नम्बर-८८ में नवेन्दु जी से भेंट कीजिये। भंसलिया का फिलिम, हमारा यही भाई एडिट किया था। जब ससुरा, इनका नाम नहीं दिया तो भाई आ गये ‘लॉ’ पढ़ने कि ‘वकील बन के केस करूँगा’। देश के हर जिला में इनके एक मौसा जी रहते है। शोले पर तो नवेन्दु जी डाक्टरेट ही हैं। अमिताभ के जींस का नाप, धन्नो का बाप, बुलेट पर कम्पनी का छाप और बसंती के घाघरा का माप तक, सब उनको मालूम है। गब्बरवा, सरईसा खैनी खाता था, वही पहली बार बताए थे।”

क्रिकेट की भी चर्चा है यहाँ और वो भी बिल्कुल ‘लगान’ स्टाइल। यदि इसे पढ़ा जाए तो हो सकता है कि आप असमंजस में पड़ जाए कि आमिर की ‘लगान’ को देख रहे हैं या ‘बनारस टॉकिज’ पढ़ रहे हैं। सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात इस नॉवल में ‘बम ब्लास्ट’ है और उससे भी ज्यादा चौंकाती है उसका खुलासा। लेखक अगर अपनी कल्पनाशक्त‍ि का उपयोग करें तो इस घटना पर अलग उपन्यास लिख सकते है और वह भी काफी नाटकीय अंदाज में।

अगर आपने छात्रावास के दिनों को जीया है तो इसे पढ़कर आप अपने पुराने दिन फिर से याद कर सकते हैं। अपने खट्टे-मिट्ठे अनुभवों को याद कर रोमांचित हो सकते हैं। कैम्पस की दोस्ती, हॉस्टल की मस्ती, गॉसिप, गर्ल्स हॉस्टल की कहानी आपकी यादें ताजा करा सकती है।

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