कल ज्यों मैं कॉलेज से घर आया
अपने बस्ते के साथ
जिसमें मेरी समस्त उपलब्धियाँ – अनुपलब्धियाँ,
और विगत वर्षों में अर्जित सम्मान व कलंक थे।
मेरी आँखों ने तुम्हारी तस्वीर
का संरक्षण कर रखा था।

ज्यों मैंने अपनी आँखें मसली,
मानो एक स्वप्न टूटा
और मेरी आँखों से गिरने लगा
तुम्हारा सौम्य स्वरुप
और तप्त भूतल पर गिर
तुमने इसकी प्यास बुझा दी।

मैंने अपने बालों को उलझाया,
और अपने चेहरे पर हथेली भर पानी मारा,
और समाप्त करने लग गया
उन समस्त संभावनाओं की ज्वाला
जिनमें हमारा – तुम्हारा मिलन विद्यमान था।
मैं कैसे बताऊँ तुम्हें की,
यूँ तो मैं नहीं करता हूँ कविता।

तुम्हारे जाते ही मेरी समस्त कविताओं की प्रेरणा
अंततः मुझसे दूर भूगर्भ हो गई।
आशान्वित हूँ कि शीघ्र सूर्य फ़िर
क्षितिज से उठेगा, और उस सवेरे के साथ,
प्रिय! मैं तुम्हें सदा के लिए भूल जाऊँगा।

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