पहली झलक के किस्से

आंखे फकत ढूंढती रहती इश्क हर गलियारों में, चार दिवारी घुट कर रहती बन्द एक आशियाने में। मुस्कुराकर वो तालीम दे गई हरकते हमारी देख कर, इश्क रश्म समझा हमने आशिक-परवानों को भेट कर। आंखो में नुर झलकती जैसे ईद की मेहताब है, लफ्ज़ होठो से निकलते जैसे शरबती शराब है। किस्मत की शाम को … Continue reading पहली झलक के किस्से

माँ का लाल

जंग के मैदान में लाल था, बेचारी माँ का हाल बेहाल था। उसकी एक झलक को तड़पती पर लाल पर देश की रक्षा का भार था। माँ का दर्द हवाओं ने उस तक पहुँचाया, "कैसा निर्मोही है तू!" उन फिज़ाओं ने उसके कानों में बुदबुदाया। नम तो उसकी भी आँखें थी, उसने भी अपना दुखड़ा … Continue reading माँ का लाल

28 मई का दिन

यादों के पन्नों को पलटने जा रही हूँ। ज़िन्दगी के उन लम्हों को क्या आसान होगा दोहराना? कोशिश हुई, इन चार सालों को कलमबद्ध करने की, पर चन्द पंक्तियों में सार्थक न हुआ...यह सफ़र... इसलिये कल्पना को स्याही में समेट रही हूँ, एक पल ठहरना मेरे संग, तुम भी और सोचना वो 28 मई का … Continue reading 28 मई का दिन

और फिर सुबह भी हो गई…

अहले सुबह की बात थी, बीती अभी ही रात थी। बह रही चारों तरफ़, आदित्य की प्रकाश थी। सबमें नई ऊर्जा, नई उमंग औ उल्लास थी। हर नजर में सज रही, नूतन सुनहरी ख्वाब थी। ये उस पहर की बात थी, पहली पहर की बात थी। पौ फटने लग गई, चिड़िया चहकने लग गई। नजरें … Continue reading और फिर सुबह भी हो गई…