एक छुपी सी तमन्ना थी मेरी,
जो कभी ख्वाहिश का नाम न ले सकी।
दबी सी रह गयी वो सीने में सालों-साल,
कभी ज़ुबा की कहानियां न बन सकी।

सुलगती रह गयी वो अंदर ही अंदर,
पर आग कभी न बन सकी,
मचलते रह गए वो विचार,
अल्फ़ाज़ कभी न बन सके।

रोती रही वह एक कोने में,
हर मात, हर पीड़ा, हर टूटे हुए ज़ज्बातों के
संघर्ष को लिए चलती रही,
चुपचाप, दबे पैर,
पर न कभी किसी को पुकार दी।

इस चुप्पी ने न जाने कितने ही
आसूं रोए होंगे,
बंद लफ्जों ने न जाने कितने,
अत्याचार सहे होंगे।

खो दिया अनगिनत लम्हों को मैंने,
न जाने कितने रिश्ते अब साथ नहीं।
काश कह दिया होता कुछ,

उस पल, उस लम्हे, उस वक़्त में,
तो शायद ऐसे हालात होते नहीं।

वो दूर खड़ा मुसाफिर अब पूछ रहा,
या शायद वो अंदर की आवाज़ का मिराज़ है,
कि “मैंने तो देख लिया संसार सारा,
तुम्हारे कदम कब बढेंगे,
बंद रखी है जो बात अंदर,
वो राज़ अब कब खुलेंगे।”

फिर अंदर की ही आवाज़ ने,
मुझमें विश्वास डाली,
जो न कही थी गाथा मैंने,
आज बिना झिझक कह डाली।

रोंगटे खड़े हो गए हैं आज यह जान कर
कितना समय, कितने ही क्षण को मैंने मौन में ही खो दिया
आज जगी है हृदय में, एक अविरल लहर सी,
मानो वह कोई हुंकार हो, या मानो हो कोई ध्वनि सी।

-अनुराग सरकार

-रासायनिक अभियंत्रण

-सत्र 2017

 

-देवेश कुमार

-वैद्युतिकी अभियंत्रण

-सत्र 2018

20191115_215945.png

One thought on “ध्वनि

  1. Here are two excellent poems by BIT Sindri Alumni. please publish both of
    them
    1. by Barmeshwar Rai (1973 – 77 Civil)

    – संस्तुती:

    जिसने जीना और जीतना सिखाया,

    उस भूमि को शत शत प्रणाम.

    जिसने विचारों को आकार दिया,

    उस संस्था को शत शत प्रणाम.

    तू कोयले के बीच कोहिनूर हो,

    देशपांडे के सपने की नूर हो.

    “नियतम कुरु कर्म त्वम” की परिभाषा हो,

    अभियंताओं की अभिलाषा हो.

    ज्ञान, विज्ञान, उन्नति, उत्कर्ष की जननी हो,

    हमारी आकांक्षाओं की मन भरनी हो.

    तू मान हो, सम्मान हो,

    हम सब की पहचान हो.

    तेरे आँचल में जो सुख स्नेह मिला,

    उस अहसास को शत शत प्रणाम.

    जिसने जीना और जीतना सीखाया,

    उस भूमि को शत शत प्रणाम.

    उस भूमि को शत शत प्रणाम.

    2. by Jai Narain (1960 – 64 Mechanical)

    BIT logo in the colors of green, yellow, black and red,

    adds “Niyatam Kuru Karmatwam” motto to our ethics chest,

    flaunting icons of engineering and the lamp of knowledge in red.

    Founded in 1949 in Patna, moved to Sindri in 1950,

    With mere six professors and sixty students,

    BIT Sindri had grown to become a prime engineering institute.

    The graduates were the prime talents,

    Contributed to the best technical growth in India,

    The expats even were backbones in rise of modern America.

    Whatever technical field of choice you chose,

    You had a core of talented fellow students to interact and compete,

    We were the family, we were the friends, those were the best days.

    The men and women students enjoyed equality on campus,

    The women showed that they were as good as the male counterpart,

    Together they studied to become future bright intellectual Engineers.

    As an alma mater when we enter the gates of the institute after a few years,

    The old memories of teachers and friends overcome our thoughts,

    Even the old buildings and hostels bring back our golden days.
    Thanks

    With Best regards

    Ramesh Yadava

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