निर्मलम् एवं संपादनीयम्
जल संरक्षणम् अनिवार्यम्।

जन्तूनां सुख जीवनं हेतु
जलस्य रक्षणं नूनं भवतु।

जल जीवन का आधार है। परंतु आज के समय में संपूर्ण विश्व जल की समस्या से जूझ रहा है। यदि वर्तमान समय में जल संरक्षण के क्षेत्र में कदम नहीं उठाए गए, जल को बूँद-बूँद कर नहीं संरक्षित किया गया, तो वह दिन दूर नहीं कि हम जल के उसी बूँद-बूँद के लिए तरस कर रह जाएँगे।
जल समस्या जैसे गंभीर मुद्दे पर ध्यान देते हुए २२ जुलाई को बी .आई .टी . सिंदरी में जल संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु “वाटर सिनेरियो इन धनबाद डिस्ट्रिक्ट: इमर्जिंग चैलेंज” विषय पर सफल कार्यशाला का आयोजन हुआ। यह कार्यशाला पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, झारखंड सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के द्वारा संयुक्त रूप से भूगर्भ शास्त्र विभाग एवं असैनिक अभियंत्रण विभाग बी.आई.टी सिंदरी की सहभागिता से आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 10:45 बजे मुख्य अतिथि श्री अमित कुमार, उपायुक्त, धनबाद, विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर एस .पी .सिंह, पूर्ववर्ती कुलपति, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा, डॉ. डी.के. सिंह, माननीय निदेशक, बीआईटी सिंदरी, प्रो. उपेंद्र प्रसाद, तथा प्रो. पी .के सिंह के द्वारा दीप प्रज्वलित कर की गई।

बीआईटी सिंदरी के भूगर्भ विभागाध्यक्ष डॉ. पी.के. सिंह ने कार्यशाला के विषय एवं इसके आयोजन की आवश्यकता से सभी सदस्यों को परिचित कराया।
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिम् कुरु।।
संस्कृत के इस मंत्र के द्वारा उन्होंने ना केवल भारतवर्ष के अनेक पवित्र नदियों का स्मरण किया, अपितु भारतीय संस्कृति में नदियों को देवतुल्य एवं पूज्य बताते हुए कहा कि इन नदियों के जल इतने पवित्र है कि इसमें स्नान करने मात्र से लोगों के समस्त कष्ट एवं विकार दूर हो जाते हैं। तदनंतर उन्होंने धनबाद का जिक्र करते हुए उसे न केवल अधिक जनसंख्या वाला जिला बताया अपितु उसे एक बड़ा औद्योगिक शहर कहते हुए, जल समस्या एवं जल संरक्षण के विषय में वहाँ मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
उसके बाद माननीय निदेशक डाॅ .डी.के. सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए, आए हुए अतिथियों का अभिनंदन एवं स्वागत किया।
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून।।
अलंकारिक दोहे का प्रयोग करते हुए, उन्होंने पानी के तीन अर्थों से लोगों को रू-ब-रू कराया। पहले अर्थ के अनुसार उन्होंने कहा कि मनुष्य में हमेशा इज्जत रहना चाहिए। दूसरे अर्थ के अनुसार किस प्रकार बिना चमक के मोती का कोई मूल्य नहीं होता है, उसी प्रकार इंसान में भी देश और चमक होनी चाहिए। तीसरे अर्थ में उन्होंने पानी को जीवनदायिनी जल कहकर परिभाषित किया। उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के कथन को दोहराते हुए कहा कि ईश्वर ने प्रकृति के साथ जुआ नहीं खेला है। ईश्वर ने हमें 70% पानी दिया है, परन्तु मात्र तीन प्रतिशत ही हम उपयोग में ला पा रहे हैं। उन्होंने इजरायल का उदाहरण देते हुए कहा कि यह देश हमारे लिए एक उदाहरण है, जिसने बहुत ही कारगर तरीके से जल संकट का प्रबंधन किया है। साथ ही उन्होंने ड्रिप इरिगेशन जैसी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर जोर दिया एवं ऐसे ही दूसरे प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देने की बात की, जिससे भविष्य में जल संकट से लड़ा जा सके। उन्होंने कहा कि हम सेंसर टेक्नोलॉजी की मदद से यह पता लगा सकते हैं कि एक पौधे को कितने जल की आवश्यकता है और उसी अनुरूप हम उस पौधे को जल प्रदान करें जिससे जल की बर्बादी पर लगाम लगाया जा सकता है। उन्होंने कलाम साहब की यह सोच कि क्यों ना हम सभी नदियों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करें पर भी चर्चा की। उसके बाद उन्होंने यह घोषणा की, कि हम सभी एक ऐसे गाँव को गोद लेने जा रहे हैं जहाँ के लोग अस्थि विकृति से ग्रसित हैं। तदनंतर उन्होंने हमारे पास एक उपयुक्त जल प्रबंधन ना होने पर चिंता जताई। अंत में उन्होंने कहा कि कोई भी समाज बुरे लोगों से भ्रष्ट नहीं होता अपितु समाज अच्छे लोगों के निष्क्रिय होने से भ्रष्ट हो जाता है। अतः हम सब को अब सजग होने की आवश्यकता है।
उसके बाद कार्यशाला के गेस्ट ऑफ ऑनर, प्रो. एस.पी.सिंह ने अपनी राय साझा करते हुए विद्यार्थियों को सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन होने की बात कही। शायराने अंदाज में उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि –

जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है;
जिंदगी के कई इम्तिहान अभी बाकी हैं;
अभी तो नापी है मुटठी भर ज़मीन आपने;
आगे अभी सारा आसमान बाकी है।

आगे उन्होंने कहा कि झारखंड की ८० प्रतिशत जमीन चट्टानों से ढकी हुई है, जिसकी वजह से यहाँ का जल-विज्ञान बहुत ही जटिल है। उन्होंने कहा कि ‘विश्व जल संस्थान, वाॅशिंगटन’ के अनुसार भारत २०२० तक बहुत ही विकट जल संकट से जूझता हुआ नजर आएगा। उन्होंने झारखण्ड में अनियोजित रुप से हो बन रहे बोरवेल एवं ०.५ मीटर प्रति वर्ष
के हिसाब से जलस्तर में हो रहे लगातार गिरावट पर चिंता जताई।
तदोपरांत कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री अमित कुमार ने अपना अभिभाषण दिया, जिसमें उन्होंने २१ जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मन की बात में जल संकट पर चिंता जताए जाने की चर्चा की। उसके बाद उन्होंने ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के गठन एवं उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने जल शक्ति अभियान चलाने की बात रखी जिससे आम आदमी को जल संकट के विषय में अवगत कराया जा सके एवं जल संरक्षण के प्रति जनसमूह की भागीदारी सुनिश्चित कराई जा सके। उन्होंने आशा जताई कि छात्रों का जल संरक्षण में अहम भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने बारिश में आई १५ प्रतिशत की कमी को चिंता का विषय माना एवं वर्षा जल संग्रहण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बारिश के आठ प्रतिशत पानी को ही हम रोक पाते हैं बाकी के 92% बहकर समुद्र में चले जाते हैं, जिस पर हमें कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने सार्वभौमिक समस्या को छोटे स्तर पर ही खत्म करने की बात करते हुए ३-आर. का उपयोग, भूमिगत जल को प्रदूषण से रोकने, जनसामान्य में जागरूकता बढ़ाने एवं वर्षा जल संग्रहण जैसे अनेकों उपाय के बारे में अपनी राय रखी।

कदम ऐसा चलो कि निशान बन जाए
काम ऐसे करो कि पहचान बन जाए,
जिंदगी ऐसे जियो कि मिसाल बन जाए।

अंत में प्रोफेसर आर. वी. सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया और इस प्रकार उद्घाटन सत्र की समाप्ति हुई।

इसके पश्चात तकनीकी सभा की शुरुआत हुई जिसमें प्रोफेसर एस .पी. सिंह, पूर्ववर्ती कुलपति, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा, डॉ पी. के. सिंह, प्रोफेसर, पर्यावरण विभाग आईआईटी आईएसएम धनबाद, प्रोफेसर एस .के. सिन्हा, भूगर्भ शास्त्र विभाग, वी.बी.यू. हजारीबाग ,श्री एस .एन .सिन्हा रिटायर्ड सुपरिटेंडिंग हाइड्रोलॉजिस्ट सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड, राँची, प्रो. एस. पी. यादव, गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कोडरमा, प्रो. एम. के. मिश्रा, रासायनिक विभाग, बीआईटी सिंदरी ने जल संरक्षण की आवश्यकता एवं एवं तरीकों के तकनीकी परिप्रेक्ष्यों के विषय में अपना प्रेजेंटेशन दिया तथा छात्रों एवं शिक्षकों के साथ इन विषयों पर चर्चा की।

प्रोफेसर एस पी सिंह ने वॉटर क्राइसिस एंड रिमेडियल मेजर्स पर अपना प्रेजेंटेशन देते हुए कहा कि 25 सौ मिलियन वर्ष पूर्व हमारे पास 6000 घन मी. पानी हुआ करता था जो कि आज के समय में मात्र 2000 घन मी. ही रह गया है। उन्होंने जल के अत्यधिक दोहन को भूमिगत जल के गिरावट का जिम्मेदार माना है। उन्होंने भूमिगत जल तथा जल के अन्य स्रोतों के लगातार तेज गति से हो रहे प्रदूषण पर चिंता जताई एवं उसके कई कारण भी गिनवाया। उन्होंने सततपोषणीय विकास की प्रक्रिया पर जोर दिया, जिससे भविष्य में जल संकट की परिस्थिति को कम से कम किया जा सके।
शोहरत की बुलंदी एक पल का तमाशा है
जिस शाख पर बैठे हैं वह टूट भी सकती है।
इसके साथ उन्होंने अपना प्रेजेंटेशन समाप्त किया।

प्रोफेसर एस के सिन्हा ने अपने प्रेजेंटेशन में सततपोषणीय विकास एवं भूमिगत जल के उपयुक्त प्रबंधन के विषय में चर्चा की।
प्रोफेसर एस पी यादव ने ग्राउंड वॉटर डायनामिक्स पर अपना प्रेजेंटेशन दिया। डॉ एम के मिश्रा ने ऐलकलीन वॉटर विषय पर चर्चा करते हुए जल प्रदूषण से हो रहे हैं पक्षियों की मौत एवं भूमि का जल में फ्लोराइड के बढ़ते स्तर को एक खतरनाक विषय बताया। एसएन सिन्हा ने आर्टिफिशियल रिचार्ज के उद्देश्यों के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि इससे ना केवल वर्तमान में जल की उपलब्धि सुनिश्चित की जा सकेगी, अपितु भविष्य में होने वाले जल संकट से लड़ने में यह कारगर सिद्ध होगा। प्रोफेसर पीके सिंह ने हाइड्रो-जियोलॉजिकल स्टडीज पर अपना प्रेजेंटेशन दिया, जिसमें उन्होंने ग्राउंड वॉटर फ्लकचुएशन ,पंपिंग टेस्ट स्टडीज एवं जियोफिजिकल स्टडीज जैसे गंभीर एवं तकनीकी रूप से कारगर पहलुओं की चर्चा की। उन्होंने भूमिगत जल के नवीकरण हेतु वर्षा को महत्व दिया। उन्होंने गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों में तेजी से हो रहे प्रदूषण पर चिंता जताते हुए उसके विभिन्न कारणों का जिक्र किया जिसमें सीवेज, इंडस्ट्री वेस्टेज एवं माइनिंग जैसे कारकों का उल्लेख किया। उन्होंने जल प्रदूषण में फ्लोराइड, आर्सेनिक एवं नाइट्रेट जैसे रसायनों को प्रमुख जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार सभी ने अपने अपने प्रेजेंटेशन के जरिए जल प्रदूषण एवं उसके संरक्षण की अनेकानेक चर्चाएँ की।

अंत में प्रोफेसर पी के सिंह ने सिंदरी के पास अवस्थित घरबड़ गाँव में पानी में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा होने के कारण उत्पन्न हो रही अस्थि विकृति की समस्या से सबको अवगत कराया तथा शोध द्वारा इसका हल निकालने की इच्छा जताई एवं विद्यार्थियों को भी इस मुहिम का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया एवं छात्रों की भी सकारात्मक प्रतिक्रिया रही।
धन्यवाद ज्ञापन के बाद एक दिवसीय कार्यशाला की समाप्ति हुई।
शुष्कं तपनं हाहाकारः
जल संरक्षणम् परिहारकः।

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