अहले सुबह की बात थी, बीती अभी ही रात थी।
बह रही चारों तरफ़, आदित्य की प्रकाश थी।
सबमें नई ऊर्जा, नई उमंग औ उल्लास थी।
हर नजर में सज रही, नूतन सुनहरी ख्वाब थी।
ये उस पहर की बात थी, पहली पहर की बात थी।

पौ फटने लग गई, चिड़िया चहकने लग गई।
नजरें सुनहरे ख्वाब को करने हकीकत लग गई।

कुछ तो हकीकत हो गए, कुछ उलझ कर ही रह गए।
कुछ लोग मंजिल पा गए, कुछ फूल थे मुरझा गए।
कुछ मंजिल के ही हो गए, कुछ रास्तों में सो गए।
कुछ रास्तों में खो गए और जागकर भी सो गए।
कुछ अहंकार में फूल गए, कुछ इंसान बनना ही भूल गए।

कई राहें ही बदल गईं, कई ख्वाब भी बदल गईं।
कुछ ख्वाब पूरी हो गई, पर कुछ अधुरी रह गई।
जो हो गई सो हो गई, जो रह गई सो रह गई।
पर शाम भी अब आ गई, और शाम अब तो हो गई।

जानता तो हूँ कि फिर सुबह भी आएगी।
वक्त की फितरत है,नई सीख भी सिखाएगी।
पर जो आज थी,
पर जो आज थी वो खो गई, और शाम अब तो हो गई
और शाम अब तो हो गई।

विचलित हो रहा था मन, पर फटकारता अंत:करण।
तू क्यूँ उदास हो गया, तू क्यूँ निराश हो गया?
क्या हूआ जो वर्धन में तेरे, कुछ शेष भी गर रह गया?

तो क्या हुआ कि तुने अबतक , कुछ भी ना कर पाया है
हर समय की मार तुमने सामने से खाया है।

क्या हूआ अगर अब तक तू सोया भी रहा।
ताप सूरज का तो तुझपर पड़ता निरंतर ही रहा।
धूप में सोया तो सोना धूप ने ही कर दिया।
धूप मात्र ने ही तुझको स्वर्ण से है जड़ दिया।

ज्ञात नही है ये तुझको, तुने खेल अद्भुत खेले हैं।
शरद, गरम, वर्षा, बसन्त सब एक दिन में झेले हैं।

फिर क्यूँ निराश हो गया, तेरा कहाँ कुछ खो गया।
खोया अगर कुछ है ही तो वो तू ही तुझसे खो गया।
रोशनी तो अभी भी है।
रोशनी तो अभी भी है, अभी भी सूरज ढला नहीं।
फिर क्यूँ रात मानकर तू शाम ही में ही सो गया।

है इरादा गर अटल, तो जाग जा हुंकार भर।
तेज अर्जुन सा प्रकट कर और चल प्रहार कर।

प्रेरक शब्द ऊर्जावान ये, मुझपर असर यूँ कर गई।
मैं शाम ही में जग गया और रात मेरी सो गई।
मैं अचंभित रह गया, हर शै अचंभित रह गई।
मैं शाम ही में जग गया और रात मेरी सो गई…
मैं शाम ही में जग गया और रात मेरी सो गई।

फिर?
फिर क्या?
फिर ये कि,

मैं रात भर जगता रहा,
मैं रात भर सोया नहीं।
और फिर सुबह भी हो गई।
और फिर सुबह भी हो गई।

अहले सुबह की बात थी,
और शाम अब तो हो गई।
मैं शाम ही में जग गया,
और रात मेरी सो गई।
मैं रात भर सोया नहीं,
और फिर सुबह भी हो गई।
और फिर सुबह भी हो गई।

– रोहन राज

कण वैद्युतिकी एवं दूरसंचार अभियंत्रण

सत्र २०1५

2 thoughts on “और फिर सुबह भी हो गई…

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