कॉलेज की इन सड़कों को देख,
कुछ यादें याद आती है,
कही-अनकही हज़ारों बातें याद आती है,
नादानी में की गई कुछ गुस्ताखियाँ,
ये बचपन से जवानी की ओर बढ़ते कदमों की हर निशानी याद आती है।
तो चलो लेतें है हम भी एक प्यारी सी सवारी ,
जिसमें बसी है मेरे यादों की एक छोटी-सी फुलवारी।
सितम्बर के महीने का वो एक सुनहरा-सा दिन था,
रग-रग में मेरी मानो भरा जोश और जुनून था,
दिल को मेरे मिला ऐसा एक सुकून था,
आखिर,कॉलेज का वो मेरा पहला वाला दिन था।
बच्चे बन के ही तो आये थे हम सब ,
एक दूसरे के लिए कितने पराये थे हम सब,
कॉलेज के कुछ ही दिनों में हम एक हो गए ,
हँसने -खेलने के बहाने अनेक हो गए।।
दोस्तों, चार साल पहले इस सफ़र की शुरुआत हुई थी ,
देशपांडे ऑडिटोरियम से जो स्टार्ट हुई थी,
बारिश की बूंदों से थी शुरुआत हमारी ,
दिन भर की बस मस्ती, फिर रात थी हमारी।।
सीनियर्स के डर से मुर्गा रोड से जाना ,
उधर गर्ल्स हॉस्टल से “मुर्गा – मुर्गा” की आवाज़ आना ,
किसी ब्लू सूट वाली लड़की को देख जोर – जोर से गाने गाना
90 मार के हॉस्टल के ओर दौड़ लगाना ,
9mm ना रखने पर मार खाना,
और फिर डर से जंगलों में रास्ते बनाना।
सोचते थे कि जल्दी यहाँ से चले जायेंगे ,
अब तो ये भी नहीं पता ये समां पाएंगे या न पाएंगे ।
याद आएगा हमसब को यूँ फर्स्ट इयर के दोस्तों से बिछड़ जाना,
वो रात को देर से सोना और सुबह की पहली क्लास में अपना अटेंडेंस खोना ।
वो रविशंकर सर का पहला लेक्चर, लेट हो जाने पर एप्लीकेशन लिखना ,
वो घनश्याम सर के Curl-Divergence का कांसेप्ट समझना,
और उनके लेक्चर के बीच किसी का पकड़ा जाना।
S.P. Mishra सर के क्लास में प्रॉक्सी लगाना ,
वो Engineering Drawing, टोप्पो मशीन से बनाना।
जैसे-तैसे करके हमसब ने निकाला था अपना पहला साल ,
बहुत खुश हुए यार, अब सिर्फ बचे थे तीन साल,
फर्स्ट इयर की रिजल्ट ने हमें हमारी असलियत दिखाई,
पहली बार जब सबने C++ में कैरी खाई।
एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख कर बोल अपने बस में कुछ नहीं है भाई,
न चाहते हुए भी इस भीड़ का हिस्सा हो गए ,
बाहर से आये हुए बच्चों को घर की याद सताती थी,
मेस की थाली में न जाने क्यूँ माँ की तस्वीर नज़र आती थी।
पर न जाने दोस्तों आज दिल में कुछ और आता है,
आज वक़्त को रोकने को जी चाहता है ,
जिन बातों का दुख था आज उनपर हँसी आती है,
न जाने क्यूँ उन पलों की याद ,दोस्तों खूब सताती है ,
कहता था “बड़ी मुश्किल से ये चार साल सह गया” ,
आज लगता है यार, कुछ पीछे रह गया ।
कही -अनकही हज़ारों बातें रह गयीं,
न भूलने वाली न सुनने वाली कुछ यादें रह गयीं।
वो सेकंड इयर में आकर जूनियर पर रौब दिखाना,
खिड़की से चिल्लाकर लाइट ऑफ करवाना ,
वो इम्तियाज़ सर के डर से हर रोज़ क्लास जाना ,
और नूतन मैम के क्लास में फर्स्ट बेंच पर बैठने के लिए लड़ना।
किसी दूसरे का क्लास टेस्ट देकर अपनी यारी निभाना ,
वो दिन-रात FOYC की तैयारी में लग जाना,
और मेरे बेसुरे गाने पर सबका जोर-जोर से ठहाके लगाना।
थर्ड इयर का मज़ा भी अलग था ,
क्लास कम और मस्ती ज्यादा थी।
वो लैब से किसी बहाने गायब हो जाना,
वो Exam के एक रात पहले सारे Syllabus ख़त्म कर जाना।
वो मेरी क्रश को देखकर सारी खबरें सुनना ,
“तुझसे न पटेगी” कहकर खिल्ली उड़ाना।
रातों-रात बैठकर पोस्टर डिज़ाइन करना,
और एक कप चाय के लिए धनबाद तक निकल जाना ।
वो टिंकू भैया की लस्सी, 12 न० की चाय,
वो भी क्या दिन थे ,क्या रात थी भाई।
अब ये सारी चीज़े कहाँ कर पाएंगे ,
एक ही बाइक पर चार लोग कहाँ बैठ पाएंगे ।
वो क्लास टेस्ट में लास्ट बेंच पर बैठने के लिए कहाँ लड़ पाएंगे ,
अब कौन रात भर जाग कर मस्ती करेगा?
मेरी शैतानियों से परेशान कौन होगा?
कभी मुझे पढ़ता देख हैरान कौन होगा?
फेल होने पर कौन हमें हिम्मत दिलाएगा?
कौन हमें चीटिंग करने की अलग-अलग तरीके सिखाएगा?
अचानक पूरानी बातों को याद कर पागलों की तरह हँसना,
न जाने यह फिर कब कर पाऊँगा?
ये समय लगता है कुछ जल्दी बीत गया ,
आज ये एक बार फिर मुझसे जीत गया ,
कहाँ मिलेगा वो BITAANSH में नाच पाना ,
एक लड़की के चक्कर में हर रोज़ MG जाना ।
अब यूं यारों के साथ कहाँ घूम पाएंगे ,
हमें अब ये सारे पल बहुत याद आयेंगे ।
आज वक़्त को रोकने को जी चाहता है ,
न जाने क्यों कुछ छूट जाने से डर लगता है।
कोई तो कहो यारों, इस वक़्त को रुक जाने को,
कुछ समय और मिल जाये एकसाथ बैठकर खाने को।
ये पल भी इतनी जल्दी कैसे ढल गया,
शिकवा है उन दो दोस्तों से जो हमें बीच में ही छोड़कर चल गया।
न जाने क्यों कुछ पीछे छूट सा रहा है ,
चेहरे पर तो मुस्कान है पर दिल में कुछ टूट सा रहा है ।
कभी-कभी हम याद करेंगे हम- तुम -सब की यादों को ,
जब हम देखेंगे ,कोने में पड़ी कॉलेज की किताबों को।
क्लास और हॉस्टल वाली कहानी होगी ख़त्म अब ,
अब अलग होंगे मंजिले और अलग होंगे हमसब ।
हॉस्टल का वो रूम जहाँ जमती थी महफिलें ,
अब वो रूम भी खाली करना पड़ रहा ।
अब आ गया वो मोड़ जिसमे अलविदा कहना पड़ रहा ,
बहुत कुछ लिखा है ,बहुत अभी बाकी है,
कुछ पल का साथ शायद अभी भी बाकी है ।
पहुँच जाओगे जब अपनी मंजिल पर ,
तब ये यार दोस्त ही याद आयेंगे ,
चाय-सुट्टे के साथ ये सारे फ़साने याद आयेंगे।
क्या पैसा ,क्या नौकरी ये तो बस यादें रह जायेंगे ,
अकेले जब भी होंगे तो ये सारे लम्हे याद आयेंगे ।
बस एक बात का डर लगता है दोस्तों,
हम अजनबी न बन जाये दोस्तों ,
जिंदगी के रंगों में दोस्ती का रंग फीका न पड़ जाए,
कही ऐसा न हो दूसरे रिश्तों के भीड़ में दोस्ती दम तोड़ जाए।
ज़िन्दगी में मिलने की फरियाद करते रहना ,
मिल न सके कभी तो याद करते रहना ।
कहो तो एक बार फिर सबके सामने बेसुरे गाने गा दूँ,
फिर चाहे जितना हँस लेना मुझपर, आज बुरा नहीं मानूँगा ।
इसी हँसी को अपने दिल में बसा लूँगा,
आखिर आ ही गया वो दिन जिसका हमें इन्तजा़र था ,
अब बिछड़ जायेंगे यार सारे जिनसे हमें बहुत प्यार था ।
मेरे दोस्त जरा ठीक से देख लो, कही कुछ छूटा न हो ,
कहीं तुम्हारी वजह से किसी का दिल टूटा न हो ।
भूल कर सारी रंजिशें आज गले मिल लो ,
एक बार फिर से मिलने का वादा कर लो ।
क्योंकि जा रहा जो वक़्त वो दुबारा आने से रहा ,
दिल थम कर आँखों में आंसू लिए अलविदा कहना पड़ रहा ।
मेरे यारों के साथ ये हँसीं पल ,दांस्ता में बदल रहा ,
आ गया वो पल जिसमें अलविदा कहना पड़ रहा ,
जिसमें अलविदा कहना पड़ रहा।

दिल से शुक्रिया है उन सभी दोस्तों को, जिनकी वजह से आज मैं हूँ और जिनकी वजह से यह जिन्दगी इतनी खुशनुमा बन गई है

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– राहुल कुमार सिंह
वैद्युतिकी अभियंत्रण, २०१५.

 

2 thoughts on “अलविदा कहना पड़ रहा

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