१.हवाएँ भी कभी-कभी शैतानियाँ करती हैं,
कभी पेड़ों से, कभी पहाड़ों से बेईमानियाँ करती हैं,
जब शाम ढले खेतों से होकर गुजरती हैं,
किसानों के छोटे बच्चों संग नादानियाँ भी करती हैं,
मंदिर में भी जाती हैं, मस्जिद में भी आती हैं,
कभी फुरसत से चर्च की घंटी भी बजाती हैं,
ओ मजहब के पहरेदारों! ज़रा इनको भी तो रोको,
कैसे सरेआम ये तुम्हारी नाफ़रमानियां  करती हैं।

……….

२. आसां कहाँ है, इन टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलना?
पर क्या करूँ, तू बचपन से मुझको यही सिखाती है,
कि सारे ज़माने की मुश्किलें मिलकर भी,
आखिर में एक ज़िद्दी से हार जातीं हैं।
झरोखें कितना भी रोकें, हवाएँ आ ही जातीं हैं,
माँ जिस दिन कोई नहीं आता,
उस दिन भी तेरी याद बहुत आती है।

…….

३.आबोहवा में धूल कुछ यूँ मिल चुकी है,
जैसे हवा ही धूल हो, और धूल ही हवा।
पर ज़र्द मिट्टी से हवाओं का रुख बताने वाले,
अक्सर ये भूल जातें हैं
कि ख़ाक ख़ौफ़ज़दा होती है
इसीलिए उसे मुट्ठी में बांध सकते हैं।
उंगलियों से फिसल कर अपना  रास्ता अख़्तियार करे,
तूफ़ान को वो हुनर आता है।

……..

४.ये ज़िन्दगी कहती हमसे है  रहती
कि बंदे हौसला रख…
कहानी में ऐसा मोड़ आएगा
बदलेंगी रुख़ हवाएँ, सन्न रह जाएँगी दिशाएँ,
हृदय पर्वत का डोलेगा, कोई कुछ भी न बोलेगा,
समां ये रंग बदलेगा, ज़माना ढंग बदलेगा।
समंदर की गहराई को कभी लोटा नाप सकता नहीं,
तू वो राज़ है, जिसको हर कोई भांप सकता नहीं।

……..

५. ज़िन्दगी एक ऐसा फ़लसफ़ा बन गयी है,
मत पूछिये जीते-जी सज़ा बन गयी है।
दरिया से गुज़र कर भी प्यासे रह जाना,
हमारी आये दिन की रज़ा बन गयी है।

…….

६.दुनिया चाहती है औरतें वो बैसाखी बन कर रहें
जो सबको खड़ा तो करती है,
पर खुद अपने पैरों पर कभी खड़ी नहीं हो पाती।

…….

७.बेवकूफियों का अपना ही एक मजा है ज़नाब,
होशियार तो सब हैं अब जमाने में।

………

८.चाँदनी रात के तले, मैं उससे सब कुछ
कह डालता हूँ
और वो भी, पगली, बड़े सब्र से सुनती जाती है।
काश खुदा ने खामोशी को भी ज़ुबान
बख्शी होती,
तो वो भी कुछ कहती, मैं भी कुछ सुनता,
जनाब! फिर बात ही कुछ और होती।
……..

९. ज़िन्दगी में ऐसा भी एक मोड़ आता है,
सजा रेशमी तोहफे में हर कोई लाता है
ढूँढने से भी खता का पता नहीं मिलता,
पर दर्द बड़े सस्ते में बेइंतहां पाता है
नेक बंदा ज़माने में गर मिल जाए,
उसे बड़ी नज़ाकत से मारा जाता है।

…….
९०.मशरूफ हैं लोग….
हर रोज़ दूसरों से लड़ने में,
और एक हम हैं ….
कि खुद  से जंग खत्म ही
नहीं होती।

~आदर्श भारद्वाज
एम.एस.आर.ई.टी,बैंगलोर

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