श्री सैय्यद मुनव्वर अली राना जी, साहित्य की दुनिया के एक ऐसे चेहरे है जिन्होंने हिन्दी एवं उर्दू साहित्य को एक नयी पहचान दिलाई। उर्दू के जानें-माने साहित्यकार मुनव्वर राना जी का जन्म २६ नवम्बर १६५२ को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुआ था। भारत विभाजन के दौरान मुनव्वर जी के कुछ रिश्तेदार पाकिस्तान चले गये थे। इनके पिताजी ने भारत में ही रहना उचित समझा। साहित्य में बचपन से ही रूचि होने की वजह से मुनव्वर जी ने साहित्यिक गतिविधियों में अपनी सक्रियता दिखानी शुरू की। उनकी रचनाएँ न केवल जीवन के सत्य से परिचय कराती है, वरन् मानवीय रिश्तों की भी समझ सिखाती है। मुनव्वर राना जी ने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी। उनके काव्य संग्रह ‘माँ’ ने लोगों को माँ से प्रेम करना सखाया। इनकी सारी रचनाओं मे एक परिपक्वता साफ झलकती है जो इंसान को झकझोरती है एवं सोचने पर मजबूर करती है। मुनव्वर राना को वर्ष 2014 में उर्दू भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। मुनव्वर राना के मुख्य काव्य संग्रह, “गज़ल गाँव’, “बदन सराय”,  “सुखन सराय, ”मुहाज़िरनामा”,  “घर अकेला हो गया”, “शहदाबा” और ”माँ” है। मुनव्वर राना ने गज़लों की लम्बी राहों में मील के पत्थर स्थापित किये हैं। उनकी बातें, सोच एवं रचनाएँ इंसान को हमेशा आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं।

सर्जना: आप हमें अपने बचपन के बारे में बताएँ और ये लेखन का सिलसिला कैसे शुरु हुआ ?

राना : मेरा पैतृक निवास स्थान रायबरेली है जो शुरू से ही साहित्यिक गतिविधियों का शहर रहा रहा है। मालिक मुहम्मद जाइसी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकारों का शहर। मेरे खानदान में काफी लोग पाकिस्तान चले गए । मगर मेरे पिताजी नहीं गए। उनका ये मानना था कि हम बुजुर्गों की ये कब्रें छोड़ के नही जायेंगे । यही हमारी पहचान है। फिर मेरे पिताजी ने 24 वर्ष तक ट्रक चलाया। मैंने अपनी पढ़ाई लखनऊ के संत जोंस स्कूल से की। उन दिनों का लखनऊ आज सपने में भी नही आ सकता है। यह भी कहा जाता था कि जिस शख्स को शायरी का शौक नही है वो लखनऊ का नहीं हो सकता है। इस शहर का अपना मिजाज़ था। फिर मेरा परिवार कलकते चला गया। यहाँ पर मैंने उमेश चंद्र कॉलेज में दाखिला लिया। घर के हालत ऐसे थे कि मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी लेकिन ज़िन्दगी ने बहुत पढ़ाया। शुरुआत में मुझे कहानियाँ और ड्रामा लिखने का शौक था। मैंने 1971 में “जय बांग्लादेश ”नामक एक नाटक लिखा और उसका निर्देशन भी किया और The Statesman में मेरी सबसे युवा के रूप में तस्वीर भी छपी। एक जाने माने डायरेक्टर मुझे अपने साथ मुम्बई भी ले जाना चाहते थे मगर घर का सबसे बड़ा बेटा होने की वजह से मेरे वालिद ने मुझे नहीं जाने दिया और मैं भी बचपन से ही आज्ञाकारी बेटा रहा हूँ। १९७२-७३ में मेरे वालिद बीमार हुए मैं एक शाम उनके पास था तो उन्होंने कहा कैसे हो और रोने लगे फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या बात हैं अब्बा ? उन्होंने कहा कि अगर मैं वापस ना आऊँ तो क्या तुम अपने परिवार को संभल लोगे ? फिर मैं ट्रांसपोर्ट के बिसनेस में आ गया चूँकि इस काम में बहुत समय लगता था तो मैं ड्रामा नहीं लिख पता था इस दौरान मुझे इश्क हुआ और मैंने इस पर कई कविताएं और ग़ज़लें लिखी। माँ से लड़ता भी था कि मुझे ये बिज़नेस में तनिक भी मन नहीं लगता है तो माँ कहती, “कंगाल से अच्छा जंजाल होता है ।इसी दौर में मुझे ये अनुभूति हुई कि मेरा मिजाज़ कुछ अलग है और मैंने लेखन की ओर कदम बढ़ा दिया । इस तरह से शुरू हुआ मेरे लेखन का सिलसिला। मैंने अपने में एक नए मुनव्वर को महसूस किया।

              “ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया

                माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया।” 

सर्जना: आप अपना प्रेरणाश्रोत किसे मानते हैं?

राना: मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं था। बस मुझे कुछ अलग करना था। मैं उस फैशन पर विश्वास नहीं करता कि मेरे प्रेरणाश्रोत शेक्सपियर या पी.बी. शैली हैं या कालिदास हैं या ग़ालिब हैं। कुछ लोग अपना नाम बड़ा करने के लिए बड़ों का नाम लेते हैं। दरअसल मेरा मानना है कि साहित्यकारों का, कवियों का एक परिवार होता है जहाँ ऊँचे और नीचे दोनों ओहदे के लोग होते हैं मगर सबको एक नज़र से ही देखा जाता है। हमें सबसे सीखना चाहिए। मैंने उर्दू , हिंदी और बांग्ला साहित्य को पढ़ा है। मुझे अनुवादित रचनाएँ पढ़ने में बहुत रूचि है। हम अलग-अलग भाषाएँ नहीं सीख सकते हैं मगर उनका अनुवाद पढ़ सकते हैं।

“Translation is like back portion of Kashmiri Shawl.”

 इसे करने में बहुत मेहनत की आवश्यकता है क्योंकि इसमें मूल रचना और अनुवाद में एक संतुलन बनाना पड़ता है। इस तरह मैंने बहुत लेखकों को पढ़ा, उनकी लेखन शैली को समझने की कोशिश की।

मैं आसान भाषा में लिखना पसंद करता हूँ। असल मायने में मैंने कई साहित्यकारों को पढ़ा है। दरअसल एक बात यह भी है कि मैंने साहित्य में एक अलग पहचान बनाने वाले लोगों की जूतियाँ तक उठाई है और उनकी जूतियों के महक बस गयी है मेरी उँगलियों में तो मैं जो भी लिखता हूँ ईश्वर की कृपा से अच्छी हो जाती है।

सर्जना : एक सवाल जो सबके मन में उमड़ता है और आपसे मिलने से पहले कई बार ये सवाल हमें भी चिकोटियाँ काटता रहा, आपकी अधिकतम गज़लें माँ पर केंद्रित है, ऐसा क्यों ?

राना : मैं जब कलकत्ता में था उस वक़्त के बांग्ला साहित्य अंग्रेज़ो से आँखें मिला रहा था, पंजे लड़ा रहा था तब तुम्हारी ग़ज़ल कोठे से उतर रही थी। बुरा तो लगता था मगर बात तो सही थी। ग़ज़ल बस प्रेमिकाओं के जिक्र तक सिमट गई थी।  फिर मैंने सोचा अगर एक औरत से प्रेम के लिए ग़ज़ल लिखी जा सकती है तो माँ के लिए क्यों नहीं? अगर आचार्य तुलसीदास अपने भगवान राम से प्रेम को एक रामचरितमानस का रूप दे सकते है तो मैं अपनी माँ के प्रेम को ग़ज़ल की शक्ल क्यों नहीं दे सकता? हालाँकि शब्दकोष में ग़ज़ल का मतलब प्रेमिका से बातें करना होता है। आज हम गंगा को माँ कहते है, यमुना को, सरस्वती को माँ कहते है यहाँ तक कि गौ को भी माँ कहते है मगर पश्चिमी सभ्यता के आगमन के बाद आज हम माँ को भी गाय समझने लगे हैं। फिर मैंने सोचा कि मैं अगर किसी भी old age home का निर्माण रोक नहीं सकता मगर मैं एक old age home की एक ईंट गिरा सकूँ तो मेरा जीवन सार्थक हो जायेगा। आज मुझे इस बात की ख़ुशी है कि कई लोग माँ पर लिखी मेरी ग़ज़लों को पढ़ कर माँ के प्रेम को समझने लगे हैं।

सर्जना : कॉलेज या स्कूल के समय की यादें जो आप हमारे साथ साझा करना चाहते हों?

राना – मुझे बचपन से ही टिफ़िन ले जाने का बहुत शौक था, मगर कभी ले नहीं जा सका क्योंकि घर के हालात ही ऐसे थे। मुझे लगता है कि अच्छी ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए या अच्छे संस्कार पाने के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि आदमी के शुरू के दिन गरीबी में गुज़रें हों। अगर आपके पास दो रुपये हों और आपकी इच्छा दस रुपये खर्च करने की हो, ये हिस्सा अगर आपने ना जिया हो तो आप ज़िन्दगी के बहुत अच्छे हिस्से से महरूम हैं। मैं बचपन से पेड़ पर चढ़ कर अपने साथियों के लिए फल तोड़ता था। हाथों में कांटे चुभ जाते थे। आज अगर कोई भी ब्लड टेस्ट हो तो मुझे तनिक भी पीड़ा की अनुभूति नहीं होती है। ऐसा था मेरा बचपन।

सर्जना- जब आपने लिखना शुरू किया तो आपको किन समस्याओं का सामना करना पड़ा?

राना – (हँसते हुए) मेरे वालिद मुझे पीटते थे। दरअसल मेरे घरवाले इसके खिलाफ थे। उनका कहना था कि ये सामान्य लोगों का काम नहीं है। मगर मेरे अंदर ये विचार घर कर गए थे कि साहित्य सिद्धार्थ को गौतम के रास्ते ले जाती है। मैं उसी रास्ते जाना चाहता था।

सर्जना – आज के युवा साहित्य क्षेत्र में नहीं जा रहे हैं। क्या ये साहित्य के लिए एक बुरा दौर है?

राना – ये तो हर ज़माने में रहा है। मैं भी आर्ट्स पढ़ना चाहता था। परंतु पिताजी के आदेश पर मुझे कॉमर्स लेना पड़ा। साहित्य एक रूचि होती है। अगर आप डॉक्टर या इंजीनियर बन जाएँ तो साहित्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी। दरअसल बात ये है कि पूरी दुनिया आज जल्दबाज़ी की शिकार हो गयी है। साहित्य एवं अन्य कलात्मक गतिविधियों के लिए वक़्त चाहिए होता है। यही एक कारण हो सकता है कि साहित्य के क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी में कमी आई है। संजीदा श्रोताओं की संख्या में भी गिरावट देखी जा रही है।

सर्जना- 70-80 के दशक के भारत और आज के भारत दोनों को आपने बहुत करीब से देखा है। क्या बदलाव आये हैं?

राना – 70 के दशक में भारत अपनी एकता और अखंडता के लिए जाना जाता था। आपसी सौहार्द्र हमारे समाज को परिवार की तरह जोड़कर रखता था। मंदिर हो या मस्जिद दोनों एक माने जाते थे। मैं कबूतरों की मिसाल देना चाहूंगा कि जो मंदिरों में जाकर बैठते है वही मस्जिदों में जाकर बैठते हैं। यही कमी आज इंसानों के बीच देखी जा रही है और मैं आपको ये अजीबोगरीब लॉजिक बताना चाहूँगा कि जिस शहर में साम्प्रदायिक तनाव होतें हैं वहां से सबसे पहले कबूतर भाग जाते हैं, मंदिरों और मस्जिदों से। मेरा यही कहना है कि 70 के दशक में सियासत का दखल धर्म में नहीं था। पैसे वालों की अलग दुनिया थी और गरीबों की अलग। सभी अपनी जगहों पर खुशी से जीवन-यापन करते थे। मैंने वो हिंदुस्तान देखा है जहाँ पूरे शहर में बस एक सिविल हॉस्पिटल होता था और पूरा शहर स्वस्थ रहता था और आज हर गली में नर्सिंग होम्स हैं और पूरा शहर बीमार है। ये कॉन्फिडेंस हम खो चुके हैं कि बुरे वक़्त में आप हमारे काम आएँगे या आपके बुरे वक़्त में हम आपके काम आएँगे? कहीं-न-कहीं यह खौफ हमारे मन में बैठ चुका है कि जब तक जो कुछ भी है हमारी ज़िन्दगी तक ही है, मरणोपरांत हमारे पास कुछ नहीं होगा। नतीजा ये हुआ की ज़्यादातर लोग आज आशावादी और स्वार्थी हो गए हैं। उस समय हर हिंदुस्तानी, दूसरे हिंदुस्तानी पर अपना हक़ समझता था। इसी सोच में आज बहुत गिरावट आयी है।

सर्जना- 80 या 90 के दशक में जो आपकी लेखन शैली थी और जो आज है उसमें क्या बदलाव आये हैं और क्या भारतीय संस्कृति में बदलाव का असर भी आप अपने साहित्य में देखते हैं?

राना – कुछ तो मायूसी बढ़ी है। आज के भारतीय संस्कृति का असर मेरे साहित्य पर भी हुआ है। 70-80 के दशक में मैं अपने युवा अवस्था में था और सोचता था कि इस समाज को मैं बदल दूंगा। अब मैं ये सोचता हूँ कि मैं, आप युवाओं को प्रशिक्षित करूँगा। आपको हालात की जंग, ज़िन्दगी की जंग, मुल्क में जो धार्मिक उन्माद है उससे जंग के लिए आमादा करूँगा।

सर्जना- आप की युवा पीढ़ी कैसे वो पुराना भारत लौटा सकती है?

राना – आप मेरा इंटरव्यू लेने इतनी दूर से आये हैं। आप चाहते हैं कि मेरा भी एक सन्देश आपकी सर्जना पत्रिका के माध्यम से लोगों तक जाए। इस तरह की सोच ही अगर सभी युवाओं के मन में घर कर जाए तो हमारा देश ज़रूर तरक्की करेगा। अभी कुछ बिगड़ा नहीं है।

                   “अभी तो मौजूद है गाँव के मिटटी में खुद्दारी

                    अभी बेवा की गैरत से महाजन हार जाता है।”

हमारे संस्कार अभी ज़िंदा हैं। हमारे खून में अब तक बुज़ुर्गों के खून की चमक मौजूद है। बस आप युवाओं को ये सोच कर चलना है कि अब तो सब हमें करना है, हमें ही मुल्क की तरक्की के लिए ज़िम्मेदारी उठानी है।

सर्जना – आपने अनेक विधाओं से अपनी साहित्यिक रचनाएँ लिखी हैं। आपको सबसे ज़्यादा रूचि किस विधा में आती है?

राना – जो मैं लिखता हूँ वो अच्छा हो जाता है (हँसते हुए)। दरअसल गद्य में मार्जिन बहुत है। मगर जो शायरी है उसकी एक सीमा है, आप उसके बाहर नहीं जा सकते। ग़ालिब जैसे शायर ने भी यह कह दिया था कि “कुछ और चाहिए गुसत (चौड़ाई) मेरे बयां के लिए”। अगर ग़ालिब जैसे शायर ने पनाह मांग ली तो हम क्या है। वैसे जब आप गद्य लिखते हैं उसमें अपने विचारों को गढ़ने के लिए बहुत सारे शब्द होते हैं। आप अपनी बात बहुत आसानी से रख सकते हैं। बहरहाल मुझे सारी विधाओं में लिखने में रूचि है।

सर्जना – आपने बहुत सारी ग़ज़लें, नज़्में लिखीं। आपकी सबसे पसंदीदा रचना कौन सी है?

राना – मेरा सबसे पसंदीदा शेर मेरी पहली ग़ज़ल से है।

                            “वक़्त की सीढ़ियों पर लेटे हैं

                              किस सदी के कवि हैं हम”

पचास साल पुराना शेर है यह मगर आज तक मैं इसे ही याद करता हूँ।

सर्जना – अभी आप वर्तमान में क्या लिख रहे हैं और हाल में आपकी कौन सी पुस्तक प्रकाशित हुई है?

राना – मैं अभी फिलहाल अपनी ऑटोबायोग्राफी लिख रहा हूँ और हाल में ही मेरी पुस्तक “तीन शहरों का चौथा आदमी” प्रकाशित हुई है।

सर्जना – आपको शहदाबा पुस्तक के लिए वर्ष 2014 का उर्दू साहित्य-अकादमी अवार्ड मिला है। आपको सर्जना की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। आप अपने शहदाबा के बारे में बताएँ?

राना – शुक्रिया! शहदाबा पुस्तक वस्तुतः उर्दू में है जिसे साहित्य अकादमी अवार्ड मिला है। वैसे मेरे अनुसार मुझे यह हिंदी में मिलना चाहिए था क्योंकि मैं जितना उर्दू का हूँ उतना ही हिंदी का भी हूँ।

       अगर मुझे चाहने वाले उर्दू के पचास लाख लोग हैं तो हिंदी के साढ़े तीन करोड़ लोग होंगे।

शहदाबा मेरी किताब नहीं है वरन ये सड़क के किनारे लगे हुए महुए का बटोरन है। बटोरन में बहुत कुछ मिल जाता है। यह किताब मैंने अस्पताल में लिखी थी। मेरी बहुत सारी रचनाएँ बिखरी हुई थीं उसे मैंने एक जगह समेटा। शहदाबा एक पूर्ण शब्द नहीं है और न ही यह किसी शब्दकोष में है। दरअसल अवध के कस्बों से सटे जंगलों में कुछ ऐसे इलाके होते हैं जिन्हें कुछ नाम देना पड़ता है। ये इलाके मिलान बिंदु के नाम से जाने जाते हैं। इन इलाकों में मधुमक्खियों के विभिन्न तरह के छज्जे होते हैं, इन्ही छज्जों के झुण्ड को आम भाषा में शहदाबा कहा जाता है। शहदाबा इसलिए क्योंकि उन छज्जों के शहद में विभिन्न तरह का स्वाद होता है। उसमें गुलाब के फूल का रस या धतूरे के फूल का रस, आम की मंजरियों का रस या और भी जंगलों के तरह-तरह के फूलों का रस होता है। इसी तरह मेरी पुस्तक शहदाबा में आपको हर तरह की शायरी का रस मिलता है जो मैंने अपने जीवनकाल में लिखे। इसमें आपको ग़ज़लें मिलेगीं, नज़्में मिलेंगीं, वो बातें जो मैंने कभी साझा नहीं की हैं और कुछ रचनाएँ मिलेगी जो मैंने अस्पताल के बिस्तर पर लिखीं। मैंने सभी रचनाओं को एक जगह इस पुस्तक में एकत्रित किया इसलिए इसका नाम शहदाबा रखा।

सर्जना – आप प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया को साहित्य का कितना महत्त्वपूर्ण माध्यम मानते हैं?

राना – प्रिंट मीडिया अपना काम बखूबी कर रहा है परंतु पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया है। आज के दौर में प्रिंट मीडिया को उसमें दिलचस्पी है जो बिकता है। अच्छी चीज़ें तो बिकती नहीं हैं, ये आज की दुनिया का दस्तूर है। प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया अगर मिलकर अच्छा काम करें तो देश में जो नफरत की आग धीरे-धीरे सुलग रही है, उसे बुझाया जा सकता है। सद्भावना की ज्योति सभी के मन में जलाई जा सकती है। सोशल मीडिया से मैं बहुत उम्मीद करता हूँ क्योंकि ये व्यक्तिगत रूप से लोगों के हाथों में है। सोशल मीडिया को एक नाम दिया जाए तो वह मजरूह सुल्तानपुरी का ये शेर होगा।

              “मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर

            लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया।”

यह हमारे लिये बहुत अच्छी बात है कि हम अपनी बात से दुनिया को जोड़ सकते हैं और कोई भी बदलाव के लिए कभी भीड़ की ज़रूरत नहीं होती है। रामचरितमानस में भी भगवान् राम का जो चरित्र-चित्रण है , उसमे अलग-अलग रंग है। हम किसी भी खंड को उनसे अलग नहीं कर सकते हैं। अगर हम सबरी को निकाल दें तो भगवान् राम के चेहरे का एक रंग कम हो जाएगा। इसी तरह सोशल मीडिया का एक यह फायदा है कि आज अगर कुछ लिखी जाए तो उसमें सारे रंग मौजूद होंगे। हालाँकि सोशल माड़िया का कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते है। मगर अच्छे विचार रखने वाले लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। डायनामाइट बनाने वाले ने इसका अविष्कार सुरंगों को घरोंदा बनाने के लिए किया था मगर आज इनसे मकान गिराए जा रहे हैं तो उसमें उस व्यक्ति का दोष नहीं है ये तो आज के हालात की बदनसीबी है। सोशल मीडिया को जिन लोगों ने बनाया है उन्होंने अच्छे काम के लिए बनाया है। अगर कोई उनका गलत इस्तेमाल करता है तो उसमें बनाने वाले का कोई दोष नहीं होगा। सोशल मीडिया उन लोगों का भी सहारा है जिन्हें अपनी बात पहुँचाने के लिए टेलीविज़न, अख़बार अन्य साधन नहीं मिलते है। वे भी अपनी बात पहुंचा सकते हैं।

सर्जना – अन्तर्विक्षा के दौरान साकेत कुमार (सत्र 2012, सर्जना) ने स्वरचित ग़ज़ल सुनाई। श्री मुनव्वर राना ने ग़ज़ल पर बहुमूल्य टिप्पणी की।

राना – आपकी ग़ज़ल बहुत अच्छी है । मैं बस यह सुझाव देना चाहूंगा कि आप लिखते रहें। आपकी सोच में परिपक्वता झलक रही है बस आपको अपनी शैली पर विशेष ध्यान देना होगा। शैली को बेहतर बनाने का एकमात्र रास्ता है कि आप पढ़ते रहिये और लिखते रहिये। अपनी रचना को सुन्दर और संजीदा बनाने के लिए उसे बार-बार पढ़ें और स्वयं संपादित करें। उदाहरण के तौर पर बताना चाहूंगा कि जैसे मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूँ, उसमे मैंने अभी ७०० पन्ने लिखें हैं, और अंत में उसमे मैं सिर्फ २०० पन्ने का ही रहने दूंगा। अपना लिखा रद्द करना भी बहुत जरूरी है क्योंकि आप अपनी रचना का बेहतर अंश निकाल सकते हैं।

सर्जना – सर्जना तकनिकी संस्थान में साहित्य का अलख जगाने में प्रयासरत है। इस पावन कार्य के लिए कोई बहुमूल्य सुझाव?

राना – साहित्य की उत्पत्ति सोच से होती है और एक अच्छी सोच लाने के लिए हमें किसी से भी हीनभावना नहीं रखनी चाहिए क्योंकि ईश्वर ने सभी को मुकम्मल बनाया है। आजकल बहुत सारे युवा कुछ भी लिखने से कतराते हैं। जिन्होंने साहित्य की शुरुआत की वो आम लोग थे। सआदत हसन मंटो जो उर्दू के महान साहित्यकार हुए हैं वो भी उर्दू में अनुत्तीर्ण हो गए थे। यह ज़रूरी नहीं कि एक इंजीनियर साहित्य के क्षेत्र में मुकाम हासिल नहीं कर सकता है। साहित्य के लिए किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं होती है। अगर कोई इंजीनियर एक पल बनाता है तो वो एक सीमित समय के लिए लोगों की सेवा करता है। मगर एक साहित्यकार कुछ लिखता है वो तब तक दिलों में जिंदा रहेगा जब तक इंसान का अस्तित्व है। सर्जना द्वारा एक तकनिकी संस्थान में साहित्य की लौ जलाना एक बहुत ही सराहनीय कार्य है। आप लोगों को ज़रूरत है कि सभी विद्यार्थियों में लगाव बढ़ाने के प्रति प्रोत्साहित करें। आप उनके मन की बात सर्जना के माध्यम से करें। यह प्रयत्न करें की आप जो लिखतें हैं वो उनके व्यावहारिक जीवन में भी प्रभाव डालें। जीवन के हरेक पहलुओं में साहित्य की महत्ता को समझने की कोशिश करें। सर्जना के सभी सदस्यों को मेरी तरफ से बहुत शुभकामनाएँ। साहित्य से जुड़िए एवं लोगों को इससे जोड़ने की कोशिश कीजिए और साहित्य को महसूस कीजिए।

 

 

 

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