भाषा महज एक अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं; हमारी संस्कृति, सभ्यता और आचरण की अभिव्यक्ति का माध्यम भी होती है। वर्तमान में एक बिंदु पर खड़ी भाषा, या फिर चहुँओर फैली भाषा, सफल और परिष्कृत…अपने साथ इतिहास के कई पदचिह्नों और बदलावों को समेटे रहती है।

भाषा से प्यार, भाषा से अपनापन, भाषा को अपनाना ही उसे जीवन देता है। एक अबोध शिशु भी प्रेम की भाषा पहचानता है। उस स्थिति में, भाषा और शिशु…एक-दूसरे को अंगीकार कर आपस में घुल जाते हैं। ऐसी ही है हमारी हिंदी ― शिशु भाषा। जितनी मीठी और सरल ये बोली है, उतनी ही प्यारी है इसके पुनर्जीवन की कहानी।

आज हिंदी का लोप भूमंडलीकरण, नव-उपनिवेशीकरण, नव-पूंजीवाद, संप्रेषण-संचार साधनों की बहुतायत के कारण है…जो कि गाहे-बगाहे हमें अपने साहित्य (समाज का दर्पण) और चलचित्रों में भी देखने को मिलती रहती है। साथ ही, यह भी बता देना उचित है कि हिंदी का पुनर्जीवन भी इन्हीं के माध्यम से हो रहा है।

‘दूसरे देशों की भाषाओं को अपनाना’ ― आज लोग इसे अपना “स्टैटस” समझते हैं। हमारी-आपकी भाषा में उसे…क्या, हाँ… “हैसियत” कहते है। मनोविज्ञान कहता है कि लोग अपने पास की चीज़ों को कम और दूसरे की चीज़ों को ज़्यादा महत्व देते है, क्योंकि वे उन्हें ज़्यादा आकर्षित करती है। हमारा झुकाव हिंदी की बजाय अंग्रेजी और फ्रेंच की ओर होता है। सही है, पर साथ में यह ज़रूरी है कि हम अपनी ज़मीनी ताकत…हमारी अपनी भाषा से जुड़े रहें।
क्योंकि,
अपनी भाषा ही हमारी पहचान है,

हमारी पहचान हमारी भाषा से है,

भाषा…

संस्कृति और सभ्यता की रूपक

स्वर्णिम इतिहास की देन!

2 thoughts on “हिंदी का पुनर्जीवन

  1. haisiyat to tik hai…….par ye bhi to ho sakta hai ki conversation ke liye koi common language chahiye aur isiliye english ko itna badawa mil raha hai….kitne log hai jo hindi bolte …mutti bhar hi. north walo ko tamil, telgu, malayalam kannada nahi ati….south walo ko hindi nahi ati, to kyu na sab ENGLISH hi bole. #english me type karne ke liye sorry

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