अगर आपको यह बोल दिया जाए कि आपको किताबें खरीदनी है तो आप पैसे दें। चलिए ठीक है! परंतु जब आपने उस किताब को एक बार अपने पुस्तकालय की अलमारी में रख दिया हो और उसे ही कुछ दिनों बाद पढ़ने की इच्छा से निकालना चाहते हों, तब भी आपको उसके लिए पैसे देने पड़ेंगे; यह बात कितनी हास्यास्पद और फ़िज़ूल तर्क वाली है।

ऐसा ही तो कुछ हो रहा है हमारे संस्थान बी.आई.टी सिन्दरी में – जहाँ एक दफ़ा अगर आपने अपने नामांकन के दौरान जरूरी कागज़ात जैसे कक्षा दशम, द्वादश के परिणाम व अन्य प्रमाण-पत्र इत्यादि को अकादमिक शाखा में जमा कर दिया, फिर उसी कागज को आप कभी जरूरत पड़ने पर निकालना चाहते हों तो आपको उसके लिए ₹100 जमा करने पड़ेंगे। यह भी कोई बात हुई, भला! आपको अपनी ही कागज़ात की छायाप्रति करवाने के लिए सौ रुपए देने पड़ते हैं, मानो अकादमिक शाखा में जमा करने के पश्चात हमारे परिणाम ज़बरदस्त तरीके-से परिवर्तित होकर ‘अव्वल’ वाली श्रेणी में आ जाते हों। ऐसा भी तो होता नहीं। पता नहीं इस मुद्दे के पक्ष में अब तक क्या-क्या तर्क दिए गए हैं। यह तो मुझे किसी ‘ऑफिशियल ब्राइब’ से कम नहीं लगता ।

जब यह बात मैंने अपने एक करीबी मित्र से कही तो उसने कह दिया “ये तो ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे कॉलेज वाले हर एक माल बेच रहे हों।” आखिर वो ऐसा क्यों न कहे। यहाँ आपको आपके ही हर एक कागज़ात ₹100 के दर से महज़ छायाप्रति करवाने के लिए दिए जा रहे है। आखिर ये क्या है? यहाँ किसी को कोई चीज़ ख़रीदनी है नहीं, उसे वापस जमा भी करना है। अगर आप अगली बार ज़रुरत महसूस करें अपने इन कागजातों की तो ₹100 के दर के हिसाब से तैयार रहें। यही बात उसे हजम नहीं हुई। आखिर होती भी तो कैसे? भला ऐसा कहीं होता है? अपने दोस्त की प्रतिक्रिया जानकर मुझे बुरा तो बहुत लगा। आखिर बात जो मेरे कॉलेज की थी। पर बात सच थी। इस पर कुतर्क ही दिया जा सकता था। और मैं किसी तरह का कुतर्क नहीं देना चाहता था। यही सोच कर मैने कुछ न कहा। आखिर हमें सच सुनने की आदत इसी जीवन में डालनी पड़ती है, थोड़ी देरी ही क्यूँ न हो जाए। मगर सच जितनी जल्दी सुना जाए, सुधार की गुंजाइश उतनी ही ज्यादा रहती है। क्यों भैया, सही कह रहा हूँ ना?

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