‘शौख़’ – यह शब्द सुनने में ही मज़ेदार है। इसके अन्दाज़ भी कुछ इसके नाम जैसे ही निराले हैं। हर इंसान की चाहत होती है कि वो अपने शौख़ पूरे करे। लेकिन मज़े की बात यह है कि इस ‘नाचीज़’ शब्द ने अपने कुछ नखरें बना रखे हैं। शौख़ पूरे होने से आप असल में दो ही समय खुशी पाएँगे, अव्वल जब आपकी शौख़ दाढ़ी-मूँछ बढ़ने की उम्र हो अर्थात् किशोरावस्था। दूसरा समय तब आता है जब आप खुद पैसा कमाना शुरू करते है। यह दौर होता है सब कुछ भूल कर अपनी कमाई के पैसे ख़र्च करने की। लेकिन धीरे-धीरे यही शौख़ हमारी ज़रूरत बन जाती है। अब इससे वह पहले वाली ख़ुशी नहीं मिलती न ही वह पहले वाला सुकून हासिल होता है। शौख़ के मायने तब बदल जाते हैं। इन्हें अब नया नाम दिया जा सकता है, ‘मेंट्नेन्स’। इन दो शब्दों में चंद संदर्भों का अंतर है। शौख़ हम हमेशा अपनी ख़ुशी के लिए पूरी करते है। यही चीज़ आगे चलकर दर्शाने लगती है कि यह शौख़ भविष्य में भी हमें बख़ूबी बनाए रखनी है क्योंकि इससे अब लोग ख़ुश होने लगे हैं। यह सच है, ‘मेंट्नेन्स’ हम दूसरों को दिखाने के लिए करते है, केवल समाज में अपने ‘स्टेटस’ बनाए रखने के लिए। शौख़ पूरे करने में जहाँ सुकून महसूस होता है वहीं ‘मेंट्नेन्स’ करने में भय का साया हमेशा साथ चलता रहता है।
इसलिए जिन्होंने अपनी शौख़ पूरे किए, उस शौख़ को अपने हुनर या व्यवसाय में तब्दील किया, वे आज एक ‘सक्सेस्फ़ुल’ व्यक्तित्व हैं।

शौख़ पूरे करे, जिससे आपको ख़ुशी मिले। (परंतु यह ध्यान रहे कि आपके शौख़ में कहीं दूसरे का कोई अहित न हो।)

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